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  • दशहरा 2026: राजस्थान में रावण दहन के अनोखे रंग, कहीं पूजन तो कहीं रौंदने की परंपरा

    दशहरा 2026: राजस्थान में रावण दहन के अनोखे रंग, कहीं पूजन तो कहीं रौंदने की परंपरा

    जयपुर
    राजस्थान में दशहरा सिर्फ रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही अनूठी परंपराओं और लोक आस्थाओं का उत्सव भी है। कहीं रावण के पुतले को पैरों तले रौंदकर अहंकार का अंत किया जाता है तो कहीं दहन से पहले उसी पुतले की पूजा होती है। झालरापाटन में रावण, मंदोदरी, कुंभकर्ण, विभीषण और मेघनाद का कुनबा करीब 186 साल से स्थायी मूर्तियों के रूप में खड़ा है।

    कोटा में जेठी समाज के अखाड़ों में मिट्टी के रावण का प्रतीकात्मक वध होता है, जिसके बाद पारंपरिक कुश्ती भी होती है। भीलवाड़ा में राम-रावण युद्ध के मंचन के बाद अग्निबाण से पुतलों का दहन आकर्षण का केंद्र रहता है। चूरू में रेलवे कर्मचारियों की पहल से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा छह दशक से अधिक समय से जारी है। सिरोही में रावण दहन के बाद जलेबी-फाफड़े की मिठास उत्सव को खास बनाती है। इन विविध रंगों में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था की झलक दिखाई देती है।

    झालरापाटनः 186 साल से खड़ा रावण का कुनबा
    झालरापाटन में दशहरे की पहचान रावण दहन से ज्यादा रावण के पूरे कुनबे की स्थायी मूर्तियों से है। यहां दशहरा मैदान में रावण के साथ मंदोदरी, कुंभकर्ण, विभीषण, मेघनाद और मारीच की मूर्तियां भी मौजूद हैं। बताया जाता है कि इनका निर्माण करीब 1840 में कराया गया था। बाद में 1920 में इन्हें पक्का स्वरूप दिया गया। इस तरह रावण का यह कुनबा करीब 186 साल से यहां खड़ा है। दूसरी जगहों पर जहां हर साल रावण का पुतला तैयार कर जलाया जाता है, वहीं झालरापाटन में ये स्थायी मूर्तियां दशहरे की ऐतिहासिक विरासत को संजोए हुए हैं। यहां मंदोदरी के वस्त्रों को लेकर भी एक मान्यता प्रचलित है। लोग उसके वस्त्रों के टुकड़े घर ले जाते हैं और इसे सुख-समृद्धि से जोड़कर देखते हैं। दशहरे के दौरान इन मूर्तियों को देखने के लिए लोग पहुंचते हैं। रावण के परिवार की स्थायी मौजूदगी इस आयोजन को राजस्थान की दूसरी दशहरा परंपराओं से अलग पहचान देती है।

    कोटा: पैरों तले रौंदकर रावण का वध
    कोटा के किशोरपुरा और नांता में जेठी समाज के अखाड़ों में दशहरे पर रावण के वध की परंपरा बाकी जगहों से अलग है। यहां मिट्टी से रावण की आकृति बनाई जाती है। दशमी की सुबह पूजा-अर्चना के बाद बच्चे इस आकृति को पैरों तले रौंदते हैं। इसे रावण के प्रतीकात्मक वध और अहंकार के अंत के रूप में देखा जाता है। इस परंपरा के साथ अखाड़ों की पुरानी खेल-संस्कृति भी जुड़ी हुई है। रावण को रौंदने की रस्म पूरी होने के बाद पारंपरिक कुश्ती का आयोजन किया जाता है। इसमें पहलवान अपने दांव-पेच दिखाते हैं और स्थानीय लोग उत्साह से मुकाबले देखते हैं। पूजा के बाद श्रद्धालुओं को ज्वारे भी बांटे जाते हैं। इस तरह यहां दशहरा केवल पुतला जलाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान, बच्चों की भागीदारी और कुश्ती की परंपरा को एक साथ जोड़ता है। किशोरपुरा और नांता के अखाड़ों में निभाई जाने वाली यह रस्म कोटा के दशहरा उत्सव की विशिष्ट पहचान है।

    भीलवाड़ा: राम के अग्निबाण से शुरू होता है रावण दहन
    भीलवाड़ा के तेजाजी चौक में दशहरा उत्सव करीब पांच दशक से आयोजित हो रहा है। यहां रावण दहन से पहले रामलीला के दौरान राम और रावण के युद्ध का मंचन किया जाता है। युद्ध के दृश्य के बाद भगवान राम का पात्र अग्निबाण चलाता है। इसके बाद आधुनिक तकनीक और रिमोट कंट्रोल की मदद से पुतलों में आग लगाई जाती है। इस तरह पारंपरिक रामलीला और आधुनिक तकनीक का मेल आयोजन को खास बनाता है। दशहरे पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है, जो आजाद चौक से शुरू होकर आयोजन स्थल तक पहुंचती है। रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी तैयार किए जाते हैं। इनके दहन के दौरान आतिशबाजी आकर्षण का केंद्र रहती है। इस आयोजन को देखने के लिए करीब 8 से 10 हजार लोगों के जुटने की जानकारी है। भीलवाडा में राम-रावण युद्ध का जीवंत मंचन, अग्निबाण और तकनीक से होने वाला दहन दशहरे को एक बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप देता है।

    सिरोही : रावण दहन के बाद जलेबी-फाफड़े का स्वाद, खाने के लिए भीड़
    सिरोही में दशहरे का उत्सव रावण दहन के साथ मिठास भी घोलता है। यहां रावण दहन के बाद जलेबी खरीदकर घर ले जाने की परंपरा है। पर्व के दिन मिठाई की दुकानों पर लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। पिछले 15-20 वर्षों में गुजरात से सटे होने के कारण जलेबी के साथ फाफड़ा खाने का चलन भी बढ़ा है। दशहरे के दिन जलेबी-फाफड़े की दुकानों और नाश्ते के ठेलों पर भीड़ नजर आती है। परिवार के लोग दहन देखने के बाद मिठाई और नाश्ता खरीदते हैं। इस तरह रावण दहन के साथ खानपान भी उत्सव का हिस्सा बन गया है। सिरोही की यह परंपरा बताती है कि त्योहारों की पहचान केवल धार्मिक आयोजन से नहीं बनती, बल्कि उनसे जुड़ी स्थानीय खानपान की आदतें भी उन्हें खास बनाती हैं। गुजरात की निकटता का असर यहां के स्वाद पर भी दिखाई देता है। बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला दशहरा सिरोही में जलेबी-फाफड़े की मिठास के साथ यादगार बनता है।

    मंडारः पूर्वजों के शस्त्रों की साफ-सफाई और पूजा से निभाते आ रहे परंपरा
    सिरोही जिले के मंडार और आसपास के गांवों में दशहरे पर शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई जाती है। राजपूत परिवारों में इस दिन पूर्वजों के शस्त्रों को बाहर निकालकर उनकी साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद शस्त्रों को मां चामुंडा के समक्ष रखकर पूजा-अर्चना की जाती है। शस्त्रों पर मौली बांधी जाती है और कुमकुम, अबीर-गुलाल तथा पुष्पों से पूजन किया जाता है। परिवार के मुखिया आरती करते हैं। इस रस्म में पुराने शस्त्र केवल हथियार नहीं, बल्कि परिवार की विरासत और पूर्वजों की स्मृतियों के प्रतीक भी होते हैं। दशहरे पर शस्त्र पूजन को शक्ति, परंपरा और पूर्वजों के प्रति सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।

    श्रीगंगानगर : घोड़े-बग्घियों पर निकलती हैं राम-रावण की झांकियां
    दशहरा आयोजन की परंपरा 74 साल से चली आ रही है और इस बार इसका 75वां आयोजन है।

     यहां की खासियत राम और रावण की सचेतन झांकियां हैं। दोनों पात्र घोड़े और बग्घियों पर सवार होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हैं। बैंड-बाजों के साथ निकलने वाली इस शोभायात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। इसके बाद रामलीला मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किय जाता है। आयोजन में झांकियों और शोभायात्रा का विशेष महत्व है, जो इसे केवल मैदान में होने वाले रावण दहन से अलग बनाता है। इस परंपरा में शहर के प्रमुख रास्ते भी उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं।

    नागौर : आटे की लोई से फेविकोल तक बदला पुतला बनाने का तरीका
    सुदरासन में रावण दहन की परंपरा करीब 30 साल पुरानी है। शुरुआत में पुतला बनाने के लिए बांस की खपच्चियों, पुराने कपड़ों, अखबार और कड़बी का इस्तेमाल किया जाता था। पुतले पर कागज चिपकाने के लिए आटे की लोई काम में ली जाती थी। समय के साथ निर्माण के तरीके में बदलाव आया है। अब पुतले के ढांचे में लोहे का इस्तेमाल होने लगा है। कागज चिपकाने के लिए आटे की लोई के बजाय फेविकोल उपयोग में लिया जाता है, जबकि चेहरे के लिए बाजार में मिलने वाले तैयार मुखौटे भी इस्तेमाल किए जाते हैं।

    अनूपगढ़ः दहन से पहले रावण की पूजा से करते विद्वता का सम्मान
    अनूपगढ़ में दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले तैयार करने वाले कारीगर दहन से पहले उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। पुतलों को खड़ा करने से पहले विधि-विधान से पूजा कर प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह परंपरा इसलिए खास है, क्योंकि जिन पुतलों को बाद में बुराई के प्रतीक के रूप में जलाया जाता है, उनके निर्माण से जुड़े लोग पहले उनका सम्मान करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण प्रकांड विद्वान था और उसका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। इसी धारणा के चलते कारीगर पुतले के प्रति श्रद्धा का भाव रखते हैं। उनका विश्वास है कि पूजा-अर्चना करने से पुतले बनाने और खड़ा करने का काम बिना किसी बाधा के पूरा होता है। रावण दहन के आयोजन में कारीगरों की मेहनत महत्वपूर्ण होती है और यह पूजा उनके काम का हिस्सा बन चुकी है। अनूपगढ़ की यह परंपरा दशहरे के उस पहलू को सामने लाती है, जिसमें बुराई के प्रतीक के दहन के साथ रावण के विद्वान होने की मान्यता भी मौजूद है।

    चूरू: 1968 में 30 फीट के पुतले से शुरू हुआ आयोजन
    चूरू की रेलवे कॉलोनी में रावण दहन की परंपरा वर्ष 1968 में शुरू हुई थी। तब यहां 30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया था। समय के साथ आयोजन का दायरा बढ़ता गया और अब पुतले की ऊंचाई 60 फीट से अधिक हो गई है। इस आयोजन की शुरुआत रेलवे कर्मचारियों की पहल पर हुई थी। धीरे-धीरे यह कॉलोनी तक सीमित रहने के बजाय शहर के सामूहिक उत्सव का रूप लेता गया। आज भी आयोजन जनसहयोग से किया जाता है। इसकी व्यवस्थाओं में अलग-अलग समुदायों के लोग बढ़ती ऊंचाई के साथ आयोजन की भागीदारी निभाते हैं। छह दशक से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि किसी छोटे सामुदायिक प्रयास को लोगों की सहभागिता किस तरह बड़े आयोजन में बदल सकती है। पुतले की पहचान भी मजबूत हुई है।

  • दशहरा आज: शस्त्र पूजन से लेकर रावण दहन तक, जानें 20 अक्टूबर के सभी शुभ मुहूर्त

    दशहरा आज: शस्त्र पूजन से लेकर रावण दहन तक, जानें 20 अक्टूबर के सभी शुभ मुहूर्त

    दशहरा : आज देशभर में दशहरा मनाया जा रहा है. यह पर्व हर साल आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है.  मान्यता है कि इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर देवी सीता को उसकी कैद से आजाद कराया था. इस दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है. इस दिन भगवान राम की पूजा, शस्त्र पूजन, दान-पुण्य के साथ-साथ रावण का पुतला दहन भी किया जाता है. देश में विभिन्न हिस्सों में आज रावण के साथ-साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा. आइए आपको शस्त्र पूजन और रावण दहन का शुभ मुहूर्त बताते हैं.

    दशहरा 2026 तिथि
    हिंदू पंचांग के मुताबिक, आश्विन शुक्ल दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी. इसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर होगा. ऐसे में दशहरे का पर्व 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को ही मनाना उचित है.

    शस्त्र पूजा का शुभ मुहूर्त
    विजयादशमी पर शस्त्र पूजन की परंपरा सदियों पुरानी है. इस दिन शस्त्रों की पूजा करके शक्ति, साहस और विजय की कामना की जाती है. मान्यता है कि विजयादशमी पर शस्त्र पूजा करने से व्यक्ति को कभी पराजय नहीं मिलती है. दशहरे पर आज शस्त्र पूजा के लिए दो शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं.

    1. विजय मुहूर्त- दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक
    2. अपराह्न पूजा मुहूर्त- दोपहर 1:14 बजे से शाम 3:30 बजे तक

    दशहरे पर रावण दहन का शुभ मुहूर्त क्या है?
    दशहरे पर रावण दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण दहन के लिए प्रदोष काल को शुभ माना जाता है. इस दौरान सूर्यास्त के आस-पास भगवान राम की विजय का उत्सव मनाया जाता है और रावण के पुतले का दहन किया जाता है. पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर को प्रदोष काल शाम 5 बजकर 47 से लेकर रात 8 बजकर 23 मिनट तक रहने वाला है. रावण दहन के लिए इस अबूझ मुहूर्त को श्रेष्ठ माना गया है. यदि आप रात्रिकाल में कोई विशेष पूजा-अर्चना करना चाहते हैं तो रात 11 बजकर 41 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 31 मिनट तक निशीता काल में कर सकते हैं.

    दशहरा 2026 चौघड़िया मुहूर्त
    दशहरे के दिन शुभ काम करने के लिए चौघड़िया मुहूर्त भी देखा जा सकता है. यदि दशहरे के दिन आप कोई शुभ कार्य करना चाहते हैं या किसी नए काम की शुरुआत करना चाहते हैं तो शुभ चौघड़िया मुहूर्त में कर सकते हैं.

    दिन का चौघड़िया
    अमृत-सुबह 6:24 से 7:49 बजे तक
    काल-सुबह 7:49 से 9:15 बजे तक
    शुभ-सुबह 9:15 से 10:40 बजे तक
    रोग-सुबह 10:40 से दोपहर 12:05 बजे तक
    उद्वेग-दोपहर 12:05 से 1:31 बजे तक
    चर-दोपहर 1:31 से 2:56 बजे तक
    लाभ-दोपहर 2:56 से शाम 4:22 बजे तक
    अमृत-शाम 4:22 से 5:47 बजे तक

    रावण दहन से पहले करें इस देवी की पूजा
    दशहरे पर देवी अपराजिता की पूजा करना शुभ माना जाता है. यह पूजा रावण दहन से पहले करनी चाहिए. मान्यता है कि इनकी आराधना से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है. व्यक्ति का कोई कार्य असफल नहीं होता है. पूजा के लिए सबसे पहले स्थान को अच्छी तरह साफ कर लें. वहां एक चौकी रखें और उस पर स्वच्छ कपड़ा बिछाएं. अब देवी अपराजिता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें. इसके बाद माता का जल और पंचामृत से अभिषेक करें. उन्हें वस्त्र, फूल, अक्षत, कुमकुम, फल, धूप और शृंगार की सामग्री अर्पित करें.

    पूजा के दौरान देवी अपराजिता की चालीसा का पाठ करें और ‘ॐ अपराजितायै नमः’ मंत्र का जाप करें. इसके बाद माता को सफेद या पीले रंग की मिठाई, फल या खीर का भोग लगाएं. अंत में देवी की आरती करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें.

    शमी की पूजा करना न भूलें
    विजयादशमी के दिन प्रदोष काल में शमी के पेड़ की पूजा करने का भी विधान है. इस दिन शमी के पेड़ की जड़ में गंगाजल चढ़ाएं. फिर पेड़ के सामने दीपक जलाएं और उसके नीचे प्रतीक के तौर पर कोई शस्त्र रखें. इसके बाद शमी वृक्ष और शस्त्र की धूप, दीप, नैवेद्य और आरती से पूजा करें. अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आप पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजन कर सकते हैं.

  • दशहरे पर शमी पूजन और शस्त्र पूजा क्यों होती है? जानें पौराणिक मान्यता और पूजा की विधि

    दशहरे पर शमी पूजन और शस्त्र पूजा क्यों होती है? जानें पौराणिक मान्यता और पूजा की विधि

      Dussehra 2026 : दशहरे पर शस्त्र पूजा करने की परंपरा आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। विजयादशमी के दिन लोग अपने पारंपरिक शस्त्रों की साफ-सफाई करके उनकी पूजा करते हैं। तलवार और दूसरे शस्त्रों के अलावा कई जगहों पर कामकाज में इस्तेमाल होने वाले औजारों की भी पूजा होती है। इस साल दशहरा 20 अक्टूबर को है। ऐसे में शस्त्र पूजा करने वाले लोग शुभ मुहूर्त में पूजा कर सकते हैं।

    शस्त्र पूजा का शुभ समय
    पंचांग के अनुसार, 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस समय शस्त्र पूजा की जा सकती है। हालांकि, स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।

    घर पर कैसे करें शस्त्र पूजा
    शस्त्र पूजा के लिए सबसे पहले पूजा की जगह साफ कर लें। शस्त्रों को सावधानी से साफ करके सुरक्षित स्थान पर रखें। पूजा के लिए रोली, अक्षत, फूल, धूप और दीपक रख लें। भगवान गणेश और मां दुर्गा का स्मरण करके पूजा शुरू करें। शस्त्रों पर रोली से तिलक लगाएं। इसके बाद फूल और अक्षत चढ़ाकर धूप-दीप दिखाएं। पूजा के बाद भोग लगाएं और प्रसाद बांट दें।

    विजयादशमी पर क्यों होती है शस्त्र पूजा?
    दशहरे को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा भी विजयादशमी से जुड़ी है। पुराने समय में राजा और योद्धा अपने शस्त्रों की पूजा करते थे। युद्ध और आत्मरक्षा में शस्त्रों की अहम भूमिका थी। इसी परंपरा के तहत आज भी कई परिवार दशहरे पर शस्त्र पूजा करते हैं। कुछ जगहों पर इस दिन औजारों और कामकाज में इस्तेमाल होने वाली मशीनों की पूजा भी की जाती है।

    दशहरे पर शमी पूजन की परंपरा
    विजयादशमी पर शमी के पेड़ की पूजा भी की जाती है। महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपाए थे। बाद में उन्होंने इन्हें वापस प्राप्त किया। इसी वजह से कई जगहों पर दशहरे के दिन शमी पूजन किया जाता है।

  • जब रावण की कैद में फंस गए थे शनिदेव, हनुमान जी ने लंका में कैसे बचाया? जानिए कथा

    जब रावण की कैद में फंस गए थे शनिदेव, हनुमान जी ने लंका में कैसे बचाया? जानिए कथा

    बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा आने वाला है. मान्यता है कि भगवान राम ने रावण का नाश करके देवी सीता को उसकी कैद से आजाद कराया था. इसी उपलक्ष्य में हर साल दशहरे के दिन रावण का पुतला दहन किया जाता है. इस साल दशहरा 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को मनाया जाएगा. रावण बेहद शक्तिशाली और मायावी असुर था. उसने अपनी शक्तियों और महाविद्याओं का गलत इस्तेमाल कर बड़े योद्धाओं और देवताओं को भी परेशानी में डाल दिया था. खुद न्याय देव शनि भी रावण के मायाजाल का शिकार हो चुके थे.

    रामायण से जुड़ी प्रस्तुतियों में क्या आपने कभी रावण के सिंहासन के नीचे एक नीले रंग की मानुष आकृति को देखा है. यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं शनि देव हैं. रावण ने अपने अहंकार में इतना चूर हो गया था कि उसने शनि को बंदी बनाकर उन्हें अपने सिंहासन के पास पैरों के नीचे दबाकर रख लिया था. इससे जुड़े एक कथा बहुत प्रचलित है.

    कैसे रावण के चंगुल में फंसे शनि?
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण तंत्र-मंत्र और ज्योतिष विद्या का जानकार था. रावण ने ब्रह्मा और शिवजी जैसे त्रिलोकी देवताओं को प्रसन्न करके मायावी शक्तियों को हासिल कर लिया था. उसे अपनी शक्तियों पर बहुत अभिमान था. एक बार रावण ने अपने पुत्र की कुंडली देखी तो उसे पता चला की उसके पुत्र की अल्प आयु लिखी है. इससे रावण बेचैन हो उठा. उसने तुरंत अपने पुत्र की कुंडली में ग्रहों की चाल को बदलना शुरू कर दिया. ताकि पुत्र के रास्ते में आने वाली हर बाधा को दूर किया जा सके. उसने सभी ग्रहों को अपने वश में कर लिया था. लेकिन शनि देव एक ऐसे ग्रह थे जो रावण के हिसाब से अपनी चाल नहीं चल रहे थे.

    इससे क्रोधित होकर रावण ने शनि देव को बंदी बना लिया और उन्हें अपने सिंहासन के पास पैरों के नीचे दबाकर रखने लगा. इस तरह वह शनिदेव की गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें अपने नियंत्रण में रखना चाहता था. कहते हैं कि जब तक शनि रावण के चुंगल में फंसे रहे, उसके पुत्र पर कभी कोई खतरा नहीं मंडराया.

    रावण की कैद से शनि को किसने बचाया?
    पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी भगवान राम का संदेश लेकर लंका पहुंचे. तब उन्होंने माता सीता की खोज की. फिर लंका में आग लगाने के शनि को मुक्त कराया. मान्यता है कि जिस कारागार में रावण ने शनि बंद कर रखा था, वहां उसके द्वार पर ही एक शिवलिंग भी स्थापित कर रहा था. ताकि कोई उसे लांघकर बाहर न आ सके. शिवलिंग के प्रति सम्मान के कारण शनि उसके ऊपर पैर रखकर बाहर नहीं आ सकते थे. लेकिन हनुमान जी स्वंय भगवान शिव के 11वें अवतार थे. इसलिए शनि को मुक्त कराने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई.