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  • अमेरिका-हूती बातचीत के बीच यमन में बदला समीकरण, लाल सागर में हूतियों की बढ़त से सऊदी परेशान

    अमेरिका-हूती बातचीत के बीच यमन में बदला समीकरण, लाल सागर में हूतियों की बढ़त से सऊदी परेशान

    दुबई 
    यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जूझ रहे सऊदी अरब के सामने अब नई मुश्किल खड़ी होती दिख रही है. सऊदी अरब के सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका और ईरान समर्थित हूतियों के बीच सीधे संपर्क की खबर सामने आई है. दोनों पक्षों के बीच ओमान में बातचीत हुई है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि अमेरिका और हूतियों के बीच कोई औपचारिक डील हुई है या नहीं। 

    मामला इसलिए अहम है क्योंकि हूतियों ने पिछले हफ्ते यमन के लाल सागर वाले इलाके में तेजी से बढ़त बनाई और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास कई द्वीपों पर कब्जा कर लिया. यह रास्ता सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए बेहद अहम है. इसी दौरान हूती ड्रोन और मिसाइल सऊदी शहरों और तेल से जुड़े ठिकानों को भी निशाना बना रहे हैं. यहां तक कि मक्का में भी हूती ड्रोन को लेकर अलर्ट जारी हुआ। 

    अमेरिका-हूती के बीच ओमान में बातचीत
    रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच पिछले वीकेंड ओमान की राजधानी मस्कट में मुलाकात हुई. यह बैठक ओमान की मध्यस्थता में हुई बताई गई है। 

    हूती प्रतिनिधिमंडल में मोहम्मद अब्दुलसलाम और अब्देलमलिक अल-अजीरी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे. रिपोर्टों के मुताबिक, हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया कि वे अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे और 2025 में हुए सीजफायर का पालन करेंगे। 

    बताया गया है कि हूतियों ने इजरायली जहाजों को निशाना बनाने की बात कही, लेकिन सऊदी जहाजों और सऊदी तेल ले जाने वाले जहाजों को निशाना बनाने की धमकी जारी रखी. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा है कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है. उन्होंने कहा कि अमेरिका को लगता है कि वह हालात पर नजर बनाए हुए है। 

    क्या अमेरिका ने हूतियों से डील कर ली?
    अभी तक अमेरिका या हूतियों की तरफ से किसी औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन बातचीत के बाद दोनों पक्षों के बीच किसी तरह की समझ बनने के संकेत जरूर मिले हैं। 

    पूर्व अमेरिकी राजनयिक नबील खौरी ने इसे एक तरह की अनौपचारिक समझ बताया है. उनके मुताबिक, हूती अमेरिकी प्रशासन को यह भरोसा दे सकते हैं कि लाल सागर में अमेरिकी और दूसरे अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. खतरा मुख्य रूप से सऊदी जहाजों और सऊदी तेल ले जाने वाले जहाजों को रहेगा। 

    अमेरिका के लिए भी यह समझ अहम हो सकती है. ईरान के साथ जंग में उलझे अमेरिका के पास हूतियों के खिलाफ लंबे समय तक सैन्य अभियान चलाने के लिए पहले जैसी क्षमता नहीं है. ऐसे में लाल सागर में जहाजों की आवाजाही बनी रहे और अमेरिकी जहाज सुरक्षित रहें, तो वॉशिंगटन के लिए हूतियों से सीधी जंग से बचना अहम हो सकता है। 

    सऊदी अरब पर बढ़ा दबाव
    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा दबाव सऊदी अरब पर पड़ता दिख रहा है. सऊदी समर्थित यमनी लड़ाके हूतियों को रोकने में अब तक कामयाब नहीं हुए हैं. सऊदी अरब के कई हवाई हमले भी हूतियों की पकड़ को निर्णायक रूप से खत्म नहीं कर पाए। 

    दूसरी तरफ पाकिस्तान और तुर्की ने भी यमन में सीधे लड़ाकू अभियान चलाने से इनकार किया है. अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हूती ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की सऊदी मांग को स्वीकार नहीं किया है. यहां तक कि रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी ने खुफिया मदद के लिए इजरायल से भी संपर्क किया है। 

    ऐसे में अगर अमेरिका और हूतियों के बीच किसी तरह की समझ बनती है और हूती अमेरिकी या दूसरे अंतरराष्ट्रीय जहाजों को छोड़कर सऊदी जहाजों को निशाना बनाते रहते हैं, तो सऊदी अरब पर दबाव और बढ़ सकता है। 

    यानी फिलहाल यह औपचारिक डील है या सिर्फ एक अनौपचारिक समझ, यह साफ नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि हूतियों के खिलाफ जंग में सऊदी अरब को अपने सबसे बड़े सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य मदद नहीं मिल रही है और उसे बढ़ते खतरे का सामना ज्यादा अकेले करना पड़ सकता है। 

  • पैसा बांटने वाला Saudi Arabia अब लेगा ₹75,876 करोड़ का लोन, MBS की आर्थिक रणनीति पर उठे सवाल

    पैसा बांटने वाला Saudi Arabia अब लेगा ₹75,876 करोड़ का लोन, MBS की आर्थिक रणनीति पर उठे सवाल

    दुबई 

    सऊदी अरब का जिक्र होते ही रियाल, तेल, ऐश और रईसी ही सबके जेहन में आता है। गगनचुंबी इमारतें और रॉकेट की रफ्तार से चलती लग्जरी कारों के देश की पहचान धनकुबेर वाले देशों के रूप में की जाती है। दुनियाभर के कई लोगों का सपना होता है कि वे सऊदी अरब में जाकर काम करें और तगड़ा पैसा कमाकर वापस लौटें। इन सब के अलावा जब भी किसी देश को पैसे की जरूरत होती है तो ज्यादातर सऊदी अरब की तरफ रुख करते हैं। लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ा उलट है। दुनिया के कई देशों को लोन की हेल्प करने वाले सऊदी को अब खुद लोन की जरूरत पड़ रही है।

    सऊदी को पड़ी 8 अरब डॉलर की जरूरत
    सऊदी अरब लंबे समय से दुनियाभर में तेल की सप्लाई करने और मध्य पूर्व का वित्तीय महाशक्ति रहा है। सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिये सऊदी अरब दुनिया भर में पैसे निवेश करता रहा है और विकासशील देशों को मदद और लोन मुहैया कराता रहा है। लेकिन शेखों के देश में एक अलग मोड आ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस वक्त सऊदी अरब का नेशनल डेट मैनेजमेंट सेंटर (NDMC) लगभग 8 अरब डॉलर के नए सिंडिकेटेड लोन के लिए बैंकों से चर्चा कर रहा है। इसे भारतीय मुद्रा में बदलने पर ₹7.6 खरब होते हैं। सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको भी इसी तरह के फाइनेंसिंग विकल्पों पर बातचीत कर रही है।

    ईरान युद्ध से टूटी सऊदी के इकॉनमी की रफ्तार
    अब सवाल ये है कि मिडिल ईस्ट में धाक रखने वाले सऊदी को आखिर इतने पैसों की जरूरत क्यों पड़ रही है? दरअसल ईरान में चल रहे युद्ध ने सऊदी अरब की इकोनॉमी पर तगड़ा असर डाला है। इस वॉर ने तेल के इंपोर्ट, सप्लाई के प्रमुख रास्तों और सप्लाई चेन पर बुरा असर पड़ा है, इसकी वजह से सऊदी अरब के तेल निर्यात में कमी आई है।

    इसके अलावा तेहरान ने सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है, जबकि ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों के लिए खतरा पैदा कर दिया है। एक तरफ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से सऊदी तेल की ब्रिकी में कमी आई है तो वहीं दूसरी ओर हूती विद्रोहियों की वजह से बाब अल मंदेब भी बंद रहता है। इन हमलों की वजह से तेल सेक्टर में लगभग 25% की गिरावट आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कोरोना महामारी के बाद से दूसरी तिमाही में सऊदी अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई।

    सऊदी को क्यों चाहिए इतने पैसे?
    सऊदी अरब का जिक्र होते ही पैसे ही पैसे नजर आते हैं, लेकिन मिडिल ईस्ट में अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद तस्वीर कुछ और ही बन गई है है। दरअसल सऊदी अरब को इतने मोटे पैसे की जरूरत की वजह उसका विजन 2030 है। बता दें कि साल 2016 में MBS द्वारा शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य तेल निर्भरता कम करके टूरिज्म, इंटरटेनमेंट, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर के माध्यम से अर्थव्यवस्था को कई क्षेत्रों में ले जाना है।

    क्राउन प्रिंस सलमान का मानना कि जब सऊदी का कच्चा तेल कम होगा या खत्म होने की कगार पर आएगा तो उसे अचानक आर्थिक समस्याओं का सामना ना करना पड़े। इसलिए अभी से ही देश की अर्थव्यवस्था को और क्षेत्रों के लिए खोलना चाहते हैं।

     

  • ईरान-इजराइल टकराव का प्रभाव: जयपुर से उड़ान भरने वाले यात्रियों को झटका, खाड़ी रूट बाधित

    ईरान-इजराइल टकराव का प्रभाव: जयपुर से उड़ान भरने वाले यात्रियों को झटका, खाड़ी रूट बाधित

    जयपुर

    ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय हवाई क्षेत्र में लगाई गई अस्थायी बंदिशों का असर अब जयपुर से संचालित अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर भी दिखने लगा है। जयपुर से खाड़ी देशों के लिए उड़ान भरने वाली कई फ्लाइट्स को अगले आदेश तक रद्द कर दिया गया है, जिससे यात्रियों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ने के बाद Etihad Airways की अबू धाबी जाने वाली फ्लाइट EY-327 रद्द कर दी गई है। इसी तरह Air Arabia की शारजाह के लिए उड़ान G9436 और Air India Express की दुबई जाने वाली फ्लाइट IX-195 भी कैंसिल कर दी गई है। इसके अलावा SpiceJet की दुबई जाने वाली फ्लाइट SG-57 भी रद्द की गई है।

    एयरपोर्ट प्रशासन की एडवाइजरी
    मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए जयपुर एयरपोर्ट प्रशासन ने यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी की है। प्रबंधन के अनुसार मिडिल ईस्ट क्षेत्र, खासकर इजराइल-ईरान संघर्ष के चलते कई अंतरराष्ट्रीय एयरस्पेस में अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिससे उड़ानों के समय और रूट में बदलाव संभव है।

    यात्रियों से अपील की गई है कि वे एयरपोर्ट पहुंचने से पहले अपनी संबंधित एयरलाइन से फ्लाइट की ताजा स्थिति की पुष्टि जरूर कर लें। बिना जानकारी के एयरपोर्ट आने से बचें और यात्रा की योजना एयरलाइन से संपर्क में रहकर ही बनाएं। एयरस्पेस बंद होने के कारण देरी, रद्दीकरण या रूट परिवर्तन जैसी स्थितियां बन सकती हैं, इसलिए अतिरिक्त समय और वैकल्पिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यात्रा करने की सलाह दी गई है।

    दुबई और शारजाह रूट सबसे ज्यादा प्रभावित
    सूत्रों के मुताबिक दुबई और शारजाह रूट पर संचालित उड़ानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। हालात सामान्य होने तक आने वाले दिनों में भी उड़ानों के संचालन में बदलाव की संभावना बनी हुई है।