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  • बिल के विरोध में साथ आए स्टालिन और विजय थलापति, DMK-TVK की रणनीति ने बढ़ाई सियासी हलचल

    बिल के विरोध में साथ आए स्टालिन और विजय थलापति, DMK-TVK की रणनीति ने बढ़ाई सियासी हलचल

    चेन्नई

    संसद के मॉनसून सत्र से पहले तमिलनाडु में परिसीमन को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सत्ताधारी पार्टी टीवीके ने इस मुद्दे पर हाथ मिला लिया है और दोनों दलों ने बिल का कड़ा विरोध करने का ऐलान किया है।

    भले ही केंद्र सरकार के 20 जुलाई से शुरू होने वाले मॉनसून सत्र के एजेंडे में फिलहाल 'परिसीमन पैकेज' शामिल नहीं है, लेकिन तमिलनाडु में इसके खिलाफ लामबंदी शुरू हो गई है। राज्य की प्रमुख पार्टी डीएमके और सत्ताधारी दल तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) ने साफ कर दिया है कि अगर संसद में परिसीमन लागू करने से जुड़ा कोई भी बिल लाया जाता है, तो उसका कड़ा विरोध किया जाएगा।

    केंद्र ने राज्यों के अधिकार छीने तो करेंगे विरोध: डीएमके
    डीएमके प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि अगर केंद्र की बीजेपी सरकार राज्यों के अधिकारों का हनन करने वाला या संविधान के खिलाफ कोई नया कानून लाती है, तो पार्टी उसके खिलाफ खड़ी होगी। उन्होंने बताया कि बीजेपी की ओर से इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने के संकेत दिए गए हैं, लेकिन पार्टी किसी भी अंतिम फैसले से पहले पूरी जानकारी मिलने का इंतजार करेगी। अन्नादुरई ने कहा, "अगर पिछली बार की तरह बिल पास किया गया, तो इसमें हमारा ही नुकसान है।"

    स्टालिन ने सांसदों को दिए कड़े निर्देश
    इससे पहले 16 जुलाई को डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने अपनी पार्टी के सांसदों के साथ एक अहम बैठक की थी। इस दौरान उन्होंने सांसदों को निर्देश दिया कि वे संसद में एक 'रचनात्मक विपक्ष' की भूमिका निभाएं और तमिलनाडु के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी कदम का डटकर विरोध करें।

    बता दें कि डीएमके लंबे समय से परिसीमन प्रस्ताव की मुखर विरोधी रही है। इसी साल 16 अप्रैल को एमके स्टालिन ने इस प्रस्तावित बिल की एक प्रतीकात्मक कॉपी को 'काला कानून' बताते हुए जला दिया था। उनका आरोप है कि इसका तमिल लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। अगले ही दिन संसद में यह बिल और संबंधित संवैधानिक संशोधन दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहे थे।

    'तमिलनाडु अपना प्रतिनिधित्व छिनने नहीं देगा'
    तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के प्रमुख और राज्य के मुख्यमंत्री थलापति विजय भी इस मामले में पूरी तरह से डीएमके के सुर में सुर मिला रहे हैं। विधानसभा चुनावों से पहले ही विजय ने परिसीमन की कवायद को केंद्र सरकार का 'भेदभावपूर्ण' कदम करार दिया था। सत्ता संभालने के बाद, 10 जुलाई को करूर के दौरे पर उन्होंने अपना स्टैंड एक बार फिर साफ किया।

    सीएम विजय ने कहा, "केंद्र सरकार की ओर से परिसीमन लागू करने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। इसे कोई भी पेश करे, तमिलनाडु इसे दृढ़ता से खारिज करेगा। हम अपना सही प्रतिनिधित्व छिनने नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई हमारा हक ना मार सके।"

    बीजेपी ने किया बचाव, एआईएडीएमके ने साधी चुप्पी
    एक तरफ जहां राज्य की प्रमुख पार्टियां इसके विरोध में मुखर हैं, वहीं बीजेपी ने परिसीमन का बचाव किया है। बीजेपी प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "परिसीमन तो होना ही है, वास्तव में इसे साल 2000 में ही हो जाना चाहिए था।" दूसरी ओर, इस पूरे विवाद पर मुख्य विपक्षी दल एआईएडीएमके के नेताओं ने फिलहाल कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।

  • कांग्रेस-डीएमके रिश्तों में बढ़ी खटास, वीसीके का गठबंधन फॉर्मूला खारिज हुआ

    कांग्रेस-डीएमके रिश्तों में बढ़ी खटास, वीसीके का गठबंधन फॉर्मूला खारिज हुआ

    नई दिल्ली
    तमिलनाडु में विजय सरकार का हिस्सा कांग्रेस और उसकी पूर्व साथी डीएमके के बीच दूरियां और बढ़ गई हैं। डीएमके ने वीसीके के उस फॉर्मूले और प्रस्ताव को नकार दिया है, जिसमें कहा गया था कि डीएमके और विजय की टीवीके दोनों को भाजपा के खिलाफ बने इंडिया गठबंधन में लाया जाए। दरअसल, वीसीके भी पूर्व में कांग्रेस की तरह डीएमके सरकार का हिस्सा थी, लेकिन बाद में विजय सरकार को समर्थन दे दिया। वीसीके चीफ थोल थिरुमावलवन ने पश्चिम बंगाल और केरल की तरह फॉर्मूला दिया था, जिसमें राज्य स्तर पर तो पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ती हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बने गठबंधन में साथ हिस्सा होती हैं। इस फॉर्मूले को कांग्रेस का भी समर्थन मिला था।

    हालांकि, डीएमके ने इसे मानने से पूरी तरह से इनकार कर दिया और कहा कि कांग्रेस ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में डीएमके को धोखा दिया, इसलिए यह मॉडल काम नहीं करेगा। ‘एनडीटीवी’ से बात करते हुए, डीएमके सांसद गणपति पी राजकुमार ने कहा कि कांग्रेस ने सिर्फ तमिलनाडु में मंत्रिपद पाने के लिए टीवीके से हाथ मिलाया और डीएमके की पीठ पर छुरा घोंप दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस वीसीके को उसे मनाने के लिए किसी दूत की तरह इस्तेमाल कर रही है।

    उन्होंने कहा, ''मुझे नहीं लगता है कि डीएमके की लीडरशिप वीसीके के प्रपोजल को मानेगी। केरल और बंगाल मॉडल तमिलनाडु में काम नहीं करेगा।'' उन्होंने कहा कि टीवीके राज्य में एक अलग ताकत बनकर उभरी, जिससे तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह से बदल गई। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ के बीच मुकाबला है, जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और कांग्रेस में मुकाबला होता है। इसके विपरीत तमिलनाडु में एक नया प्लेयर टीवीके मैदान में आ गया है।

    'टीवीके का कोई सांसद नहीं'
    उन्होंने कहा कि टीवीके का कोई भी सांसद नहीं है, लेकिन इसके बाद भी उसे इंडिया ब्लॉक का हिस्सा बनने के लिए कहा जा रहा है। इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा डीएमके की मुख्य विचाराधारा विरोधी पार्टी है। वह राज्यों में क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने पर लगी हुई है। सांसद का साफ कहना है कि कांग्रेस और डीएमके के बीच अभी तक सबकुछ ठीक नहीं हुआ है और अगर होता भी है तो उसमें भी काफी समय लग जाएगा। डीएमके का इंडिया अलायंस से अलग होना, सांसद ने इसे इंडिया अलायंस के लिए बड़ा झटका बताया।

    क्या है बंगाल-केरल मॉडल?
    दरअसल, बंगाल और केरल में कांग्रेस और रीजनल पार्टियों के बीच कड़ी टक्कर रहती है, लेकिन नेशनल लेवल पर ये तमाम दल इंडिया गठबंधन का ही हिस्सा हैं। जहां पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी और कांग्रेस लंबे समय से एक-दूसरे के खिलाफ हैं और चुनाव लड़ती रही है तो यही हालत केरल में भी है। केरल में कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूडीएफ और लेफ्ट की लीडरशिप वाले एलडीएफ के बीच सत्ता को लेकर टकराव होता है। विधानसभा चुनाव के दौरान ये दल एक-दूसरे के खिलाफ जमकर बयानबाजी करते हैं, लेकिन जब मामला राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का आता है, तो ये सभी पार्टियां कांग्रेस के साथ आकर भाजपा का विरोध करती हैं। इसी मॉडल के तहत डीएमके और टीवीके के विजय, दोनों को इंडिया अलायंस का हिस्सा बनाए जाने की कवायद हो रही है। हालांकि, डीएमके ने फॉर्मूला मानने से इनकार कर दिया है।

  • तमिलनाडु चुनाव: DMK लड़ेगी 164 सीटों पर, स्टालिन उतरेंगे इस सीट से चुनावी मैदान में

    तमिलनाडु चुनाव: DMK लड़ेगी 164 सीटों पर, स्टालिन उतरेंगे इस सीट से चुनावी मैदान में

    चेन्नई

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए डीएमके ने सीटों का बंटवारा तय कर लिया है। सत्ता में बैठी डीएमके 234 में से 164 सीटों पर लड़ेगी, जबकि सहयोगियों के लिए 70 सीटें छोड़ी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कोलाथुर से चुनाव लड़ेंगे।

    तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों के लिए डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन में दूसरे नंबर पर कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस को इस चुनाव में 28 सीटें मिली है। तीसरे नंबर पर डीएमडीके है, जो कि 10 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। चौथे नंबर पर वीसीके है, जो 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इसके अलावा सीपीएम और सीपीआई भी पांच-पांच सीटों को हासिल करने में कामयाब रहीं। गठबंधन में शामिल बाकी अन्य पार्टियां भी अपने प्रभुत्व अनुसार चुनाव लड़ेंगी।

    मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने डीएमके के खाते में आई 164 सीटों पर उम्मीदवारों का भी ऐलान किया। मुख्यमंत्री स्टालिन अपनी पारंपरिक सीट कोलाथुर से चुनाव में हिस्सा लेंगे, वहीं उनके बेटे और उपमुख्यमंत्री उदयानिधि स्टालिन चेपॉक तिरुवल्लिकेनी से ही चुनावी मैदान में होंगे।

    इसके अलावा राज्य की कई हाई प्रोफाइल सीटों पर भी उम्मीवारों की घोषणा की गई। इसमें कोयंबटूर दक्षिण से राज्य सरकार में मंत्री सेंथिल बालाजी चुनाव लड़ेंगे। पिछली विधानसभा में वह करूर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।

    आपको बता दें, तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का मुकाबला इस बार दिलचस्प हो गया है। आम तौर पर यहां डीएमके और एआईडीएमके के बीच में ही मुकाबला होता है। इनमें डीएमके के साथ कांग्रेस खड़ी नजर आती है, तो वहीं एआईडीएमके के साथ भाजपा मैदान में होती है। लेकिन इस बार फिल्म अभिनेता से नेता बने विजय भी मैदान में हैं। इससे दोनों ही गठबंधनों की चिंता बढ़ गई है।

    सत्तारुढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रहे स्टालिन एक बार फिर से कांग्रेस और वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव जीतने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा के साथ लोकसभा चुनाव की खट्टी-मीठी यादों को भुलाकर एआईडीएमके राज्य में अपनी खोई हुई सत्ता को दोबारा हासिल करने की कोशिश में है।