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  • साइबर अपराध के खिलाफ यूपी की बड़ी कार्रवाई, 84 हजार जागरूकता अभियान से मजबूत हुआ डिजिटल डिफेंस

    साइबर अपराध के खिलाफ यूपी की बड़ी कार्रवाई, 84 हजार जागरूकता अभियान से मजबूत हुआ डिजिटल डिफेंस

    साइबर ठगों पर खाकी का ‘डिजिटल वज्रपात’

    ठगी के बाद धनराशि को रोकने में राष्ट्रीय औसत से आगे निकला यूपी

    यूपी में धनराशि फ्रीज दर सितम्बर में बढ़कर 34% हो गई, जबकि राष्ट्रीय औसत 31%

    सीएम योगी के नेतृत्व में यूपी का साइबर डिफेंस हुआ मजबूत, 84 हजार साइबर अवेयरनेस ड्राइव से तोड़ी गई डिजिटल जालसाजों की रीढ़

    साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर बना डिजिटल ढाल, टेक्नोलॉजी से ठगों का नेटवर्क ध्वस्त कर रही योगी सरकार

    लखनऊ,
     साइबर ठगी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में पुलिस की कार्रवाई को तकनीक के जरिए मजबूत किया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में साइबर अपराध की रोकथाम के साथ ही ठगी के बाद धनराशि को रोकने और वापस कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सितंबर में साइबर फ्रॉड की रकम फ्रीज कराने की प्रदेश की दर 34 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत से अधिक है। साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर के माध्यम से रियल टाइम रूटिंग के जरिये डाइवर्ट की गई रकम को फ्रीज और रिकवर कराने की कार्रवाई की जा रही है। कई मामलों में तय समय सीमा के भीतर 100 प्रतिशत तक रिकवरी दर्ज की गई है।

    प्रदेश में साइबर अपराध से बचाव के लिए 84 हजार साइबर अवेयरनेस ड्राइव भी चलाए गए हैं। इन अभियानों के माध्यम से लोगों को फिशिंग, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी, फर्जी अप्रूवल और साइबर ठगी के दूसरे तरीकों के प्रति जागरूक किया गया। सिनेमा हॉल से लेकर रेलवे स्टेशन तक विभिन्न स्थानों पर लोगों को डिजिटल लेनदेन में सावधानी बरतने और किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म की प्रामाणिकता जांचने की जानकारी दी गई।

    रियल टाइम ट्रैकिंग से रकम रोकने की कोशिश

    साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर साइबर ठगी की रकम रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। शिकायत मिलते ही संबंधित बैंक के माध्यम से रकम को रोकने की कार्रवाई शुरू की जाती है। रियल टाइम रूटिंग और डेटा शेयरिंग के जरिये डाइवर्ट किए गए फंड को फ्रीज कराने और उसे वापस कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। इससे ठगी के बाद रकम के तेजी से दूसरे खातों में जाने की चुनौती से निपटने में मदद मिलती है।

    डीजी साइबर क्राइम ने जवानों को अत्याधुनिक तकनीक से किया लैस

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर डीजी साइबर क्राइम विनोद कुमार सिंह ने प्रदेश के पुलिस कर्मियों को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया है। इसके अलावा जवानों को साइबर अपराध से मुकाबले के लिए नई तकनीक की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। एआई-डीपफेक, म्यूल अकाउंट और साइबर अपराध के बदलते तरीकों को देखते हुए पुलिस की तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

    गोल्डन आवर में शिकायत जरूरी

    एसपी साइबर क्राइम राजेश यादव ने बताया कि साइबर फ्रॉड में समय सबसे महत्वपूर्ण है। पहले एक घंटे के भीतर शिकायत करने पर रकम को होल्ड या फ्रीज कराने की संभावना काफी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि फिशिंग, फर्जी वेबसाइट, डेटा चोरी और फर्जी अप्रूवल समेत कई तरीकों से साइबर अपराधी लोगों को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते समय उसकी प्रामाणिकता की जांच करना और सतर्क रहना जरूरी है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में साइबर अपराध से निपटने के लिए प्रदेश में मजबूत व्यवस्था की गई है। हर थाने में साइबर हेल्प डेस्क है। वहीं लखनऊ में 1930 कॉल सेंटर और साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर संचालित किया जा रहा है। शिकायत मिलते ही संबंधित बैंक के माध्यम से रकम रोकने की कार्रवाई की जाती है।

    सिर्फ पुलिस नहीं, समाज की भागीदारी भी जरूरी

    साइबर अपराध की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। इसलिए इससे मुकाबले के लिए पुलिस और बैंकों के साथ स्कूल-कॉलेज, ग्राम पंचायत, स्वयं सहायता समूह, यूथ एवं स्पोर्ट्स क्लब और स्थानीय संगठनों की भागीदारी भी जरूरी है। जागरूकता और त्वरित शिकायत के जरिये साइबर ठगी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

  • डिजिटल और पारदर्शी राजस्व व्यवस्था से सुशासन का नया अध्याय

    डिजिटल और पारदर्शी राजस्व व्यवस्था से सुशासन का नया अध्याय

    ​डिजिटल और पारदर्शी राजस्व प्रशासन: जनहित में सुशासन का नया अध्याय

    ​रायपुर

           राज्य सरकार का राजस्व विभाग आम नागरिकों के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटक है। भूमि संबंधी मामलों की जटिलताओं को समाप्त करने, प्रशासनिक तंत्र को अधिक पारदर्शी बनाने और आम जनता को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से राजस्व विभाग द्वारा हाल ही में कई बड़े और दूरगामी नीतिगत निर्णय लिए गए हैं। ये सुधार न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुगम और सरल बना रहे हैं, बल्कि वर्षों से लंबित पड़ी समस्याओं का समयबद्ध व निष्पक्ष निराकरण भी सुनिश्चित कर रहे हैं।

    ​डिजिटल प्रणाली से सुगम हुआ रिकॉर्ड प्रेषण

          02 अप्रैल 2025 को जारी विशेष आदेश के तहत अब सभी भौतिक दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में प्राप्त करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। भारसाधक अधिकारी को सत्यापनकर्ता का दायित्व सौंपते हुए अब समस्त राजस्व रिकॉर्ड ई-प्रणाली के माध्यम से मंगाया जा रहा है। इस ऐतिहासिक पहल से रिकॉर्ड के त्वरित संप्रेषण की सुविधा मिली है, जिससे कागजी औपचारिकताओं में होने वाला अनावश्यक विलंब पूरी तरह समाप्त हो गया है और प्रकरणों के निराकरण में अप्रत्याशित गति आई है।

    ​कृषि भूमि की अदला-बदली हुई आसान

           कृषकों और भू-स्वामियों को अपनी सुविधा अनुसार कृषि भूमि की परस्पर अदला-बदली करने का विधिक अधिकार संहित के तहत प्राप्त है। इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुगम और स्पष्ट बनाने के लिए 21 अक्टूबर 2025 को नए मार्गदर्शी निर्देश जारी किए गए हैं। इससे किसानों को अपनी ज़मीन के बेहतर प्रबंधन में काफी सहूलियत मिल रही है।

    ​त्रुटि सुधार प्रक्रिया का सरलीकरण

           अक्सर राजस्व अभिलेखों में लिपिकीय या मामूली त्रुटियों जैसे नाम, जाति, पता या फसल प्रविष्टि के कारण भू-स्वामियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। 19 जुलाई 2024 की अधिसूचना के माध्यम से इन त्रुटियों के त्वरित सुधार हेतु सीधे तहसीलदार को सशक्त बनाया गया है। इस फैसले ने आम जनता के अदालती चक्करों और समय की बर्बादी को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
        ​अवैध प्लाटिंग पर कड़ी नकेल

           जनवरी 2026 में राजस्व विभाग ने अवैध प्लाटिंग पर प्रभावी रोक लगाने के लिए सभी जिला कलेक्टरों को कड़े निर्देश जारी किए। जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित विशेष समिति अब अवैध प्लाटिंग के खिलाफ समुचित व त्वरित कानूनी कार्यवाही कर रही है, जिससे आम खरीदारों के हितों की रक्षा हो रही है।

    ​पुराने परिपत्रों का निरस्तीकरण

          प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रासंगिक और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से 23 जुलाई 2024 के आदेश द्वारा नगरीय क्षेत्रों में शासकीय भूमि एवं अतिक्रमित भूमि के व्यवस्थापन तथा आवंटन से संबंधित 2019, 2020 और 2022 के पूर्व परिपत्रों एवं निर्देशों को निरस्त कर दिया गया है।
            ​डिजिटल ई-प्रणाली, प्रक्रियाओं के सरलीकरण और त्वरित निवारण की इस समावेशी नीति ने राज्य के राजस्व प्रशासन को एक नई दिशा दी है। यह कदम सुशासन की दिशा में एक सशक्त और जन-हितैषी प्रयास सिद्ध हो रहा है।

     ​विष्णु प्रसाद वर्मा
     सहायक संचालक

  • डिजिटल सेवाओं से बदली तस्वीर, क्रेडिट बैंक और डिजीलॉकर बने ‘सेवा का संकल्प’ की ताकत

    डिजिटल सेवाओं से बदली तस्वीर, क्रेडिट बैंक और डिजीलॉकर बने ‘सेवा का संकल्प’ की ताकत

    विशेष लेख

    सेवा_संकल्प_अभियान

    डिजिटल पंख: क्रेडिट बैंक और डिजीलॉकर से गढ़ी 'कहानी बदलाव की', पूरा हुआ 'सेवा का संकल्प'

     रायपुर

    ​राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अंतर्गत केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग के समन्वय से शुरू हुई 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट' (ABC) और डिजीलॉकर एकीकरण योजना ने राज्य में शिक्षा का परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है। सत्र 2023-24 से लागू हुई यह व्यवस्था वर्ष 2026 में पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है, जिससे राज्य के 6.5 लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य सुरक्षित और सुगम हो गया है।
    ​यह पहल छत्तीसगढ़ में सुदूर वनांचल से लेकर शहरी क्षेत्रों तक सुशासन और 'सेवा आपके द्वार' की अवधारणा को चरितार्थ कर रही है।

    ​डिजिटल लॉकर: सुरक्षा और स्वतंत्रता का आधार

    ​        नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी (NAD) से जुड़े विश्वविद्यालयों के माध्यम से अब डिग्रियां और अंकसूचियां सीधे डिजीलॉकर में सुरक्षित हो रही हैं, जिससे प्रमाणपत्रों के गुम या खराब होने का जोखिम खत्म हो चुका है। डिजिटल दस्तावेज कानूनी रूप से मूल हार्ड कॉपी के समान मान्य हैं। इससे युवाओं को अब नौकरियों या प्रवेश के लिए यूनिवर्सिटी के चक्कर नहीं काटने पड़ते।

    ​विद्यार्थियों के जीवन में 'कहानी बदलाव की'

            यह योजना विद्यार्थियों को "मल्टीपल एंट्री एंड एग्जिट" की स्वतंत्रता देती है। यदि बस्तर का कोई छात्र पारिवारिक परिस्थितियों के कारण दो वर्ष की पढ़ाई के बाद कॉलेज छोड़ता है, तो उसके कमाए हुए क्रेडिट उसकी ABC ID में सुरक्षित रहते हैं। कुछ वर्षों बाद वह रायपुर, बिलासपुर या देश के किसी भी विश्वविद्यालय में सीधे तीसरे वर्ष में दाखिला लेकर अपनी शिक्षा पूरी कर सकता है। पहले जहाँ पढ़ाई छूटने पर मेहनत 'जीरो' मानी जाती थी, वहीं अब क्रेडिट बैंक युवाओं के सपनों को टूटने से बचा रहा है।

    ​शत-प्रतिशत केंद्रीय सहयोग से व्यापक विस्तार

            इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रदान की गई शत-प्रतिशत तकनीकी व वित्तीय सहायता से यह पूरी डिजिटल अवसंरचना राज्य को निःशुल्क प्राप्त हुई है।        ​पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय (रायपुर), अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय (बिलासपुर) और शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय (बस्तर) सहित राज्य के सभी 33 जिलों के शासकीय व निजी महाविद्यालय इस अभियान से जुड़ चुके हैं। सुकमा और बीजापुर से लेकर सरगुजा तक के छात्रों को देशव्यापी स्तर पर क्रेडिट ट्रांसफर की सुविधा देकर इस व्यवस्था ने डिजिटल फासले को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।

      विष्णु प्रसाद वर्मा
    सहायक संचालक

  • डिजिटल एड्रेसिंग में India Post की नई पहल, DigiPIN से हर जगह की होगी सटीक पहचान

    डिजिटल एड्रेसिंग में India Post की नई पहल, DigiPIN से हर जगह की होगी सटीक पहचान

    भोपाल 

    भारतीय डाक ने देश में जगहों की डिजिटल पहचान के लिए ‘डिजिपिन’ यानी डिजिटल पोस्टल इंडेक्स नंबर शुरू किया है। इसके तहत हर जगह को 10 अक्षरों और अंकों का एक खास कोड मिलेगा। इससे किसी जगह की पहचान मौजूदा 6 अंकों वाले पिन कोड से ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकेगी।

    खास बात यह है कि डिजिपिन मौजूदा पिन कोड की जगह नहीं लेगा। इसे पुराने पते और पिन कोड के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसे डाक विभाग ने आईआईटी हैदराबाद और इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के साथ मिलकर तैयार किया है।

    भारतीय डाक विभाग (इंडिया पोस्ट) ने देशभर में पते (एड्रेस) की खोज और डिलीवरी सेवाओं को अधिक सटीक और आधुनिक बनाने के लिए एक नया डिजिटल पोस्टल इंडेक्स नंबर यानी 'डिजिपिन' (DigiPIN) लॉन्च किया है। यह एक जियो-कोडेड एड्रेसिंग सिस्टम है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) और आईआईटी हैदराबाद के सहयोग से तैयार किया गया है। यह टैक्नोलॉज देश के किसी भी कोने में मौजूद किसी खास स्थान की सटीक पहचान करने में मदद करेगी।

    6-अंकों वाले पिन कोड से कैसे अलग है डिजिपिन?
    हमारा पारंपरिक 6-अंकों का पिन कोड एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र, जैसे किसी पूरे इलाके, डाकघर या गांवों के समूह को दर्शाता है। इससे किसी खास मकान या जगह तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसके विपरीत, डिजिपिन पूरे भारत को करीब 4 मीटर x 4 मीटर के छोटे-छोटे ग्रिड में बांटता है। हर ग्रिड को 10 अक्षरों और अंकों (अल्फान्यूमेरिक) से मिलकर बना एक यूनिक कोड दिया गया है। यह कोड अक्षांश और देशांतर (लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड) के आधार पर तैयार होता है, जिससे किसी भी सटीक स्थान को चंद मीटर के दायरे में पहचाना जा सकता है।

    क्या बंद हो जाएगा पुराना पिन कोड?
    डिजिपिन के आने से पुराना पिन कोड बिल्कुल बंद नहीं होगा। डाक विभाग ने स्पष्ट किया है कि डिजिपिन पुराने 6-अंकों वाले पिन कोड या पारंपरिक पते की जगह नहीं लेगा, बल्कि यह उनके साथ एक अतिरिक्त डिजिटल लेयर के रूप में काम करेगा। आम नागरिक अपने पारंपरिक पते और पुराने पिन कोड के साथ डिजिपिन का उपयोग भी कर सकेंगे, ताकि कोरियर या अन्य सेवाएं बिना किसी भटकाव के उनके दरवाजे तक पहुंच सकें।

    ऑफलाइन सुविधा और आम नागरिक को होने वाले फायदे
    डिजिपिन का सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में होगा जहां मकान नंबर, गली या सड़क का नाम सही तरीके से दर्ज नहीं है। गांवों, दूर-दराज के इलाकों और बिना नाम वाली गलियों में भी अब सटीक पता खोजना आसान हो जाएगा। इस सिस्टम की एक खास बात यह भी है कि यह ऑफलाइन काम कर सकता है। एक बार लोकेशन के आधार पर डिजिपिन कोड जनरेट हो जाने के बाद, इसे इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है।

    इमरजेंसी सेवाओं और डिलीवरी में क्रांतिकारी बदलाव
    ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए डिजिपिन बेहद मददगार साबित होगा। पार्सल डिलीवरी में लगने वाला समय और पते न मिलने की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस, एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और आपदा राहत टीमों को आपात स्थिति में तुरंत और सटीक जगह पर पहुंचने में आसानी होगी। इसके अलावा, डिजिटल केवाईसी (KYC), सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन और सरकारी संपत्तियों की मैपिंग में भी डिजिपिन की बड़ी भूमिका होगी।

    पना डिजिपिन (DigiPIN) कैसे खोजें?
    डाक विभाग ने यूजर्स के लिए 'नो योर डिजिपिन' (Know Your DIGIPIN) नाम से एक वेब एप्लिकेशन लॉन्च किया है। इसे इस्तेमाल करने के लिए किसी भी अकाउंट या लॉगिन की जरूरत नहीं है। नागरिक इंडिया पोस्ट की वेबसाइट पर जाकर अपने मोबाइल या डिवाइस की लोकेशन ऑन करके तुरंत अपनी वर्तमान जगह का डिजिपिन हासिल कर सकते हैं। यह पूरा सिस्टम ओपन-सोर्स है, ताकि अन्य संस्थाएं भी इसे आसानी से अपना सकें।

  • भूमि विवादों पर लगेगा ब्रेक! पंजाब में डिजिटल मैपिंग से तय होगा संपत्ति का असली मालिक

    भूमि विवादों पर लगेगा ब्रेक! पंजाब में डिजिटल मैपिंग से तय होगा संपत्ति का असली मालिक

     चंडीगढ़
    पंजाब के शहरी क्षेत्रों में भूमि से जुड़े विवादों का निपटारा होगा और साथ ही असल मालिकों को संपत्ति हक मिलेगा जिसके लिए स्थानीय निकाय विभाग ने डोर-टू-डोर सर्वे शुरू कर दिया है।पायलट प्रोजेक्ट के तहत बनूड, राजपुरा, खन्ना और बरनाला में यह परियोजना शुरू की गई है जिसके बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। इन चार शहरों में 2 लाख संपत्तियों का सर्वेक्षण किया जा रहा है।

    यह परियोजना केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों की तर्ज पर शहरी इलाकों में लागू की जा रही है। पंजाब सरकार परियोजना के लिए छह शहरों को चुना था जिसमें मोहाली और डेराबस्सी भी शामिल था लेकिन इन दो शहरों में मंजूरी न मिलने के कारण फिलहाल सिर्फ चार शहरों में ही परियोजना शुरू की जा रही है। केंद्र सरकार ने इस पूरी परियोजना के लिए फंड उपलब्ध कराया है जबकि स्थानीय निकाय विभाग सर्वे का काम देख रहा है।

    रोवर मशीन का उपयोग सैटेलाइट संकेतों और आधुनिक तकनीक के जरिये इंच-इंच जमीन की सटीक माप और सीमांकन के लिए किया जा रहा है ताकि एक सही भूमि रिकॉर्ड तैयार किया जा सके। सर्वेक्षण टीमों को एक विशेष टैबलेट दिया गया है जिसमें सॉफ्टवेयर इंस्टॉल हैं और यह टैबलेट ब्लूटूथ के जरिये रोवर मशीन से जुड़ा होता है।

    सर्वेक्षण के लिए 71 टीमों को किया तैनात
    परियोजना के तहत संपत्तियों का ड्रोन से डिजिटल सर्वे पहले पूरा हो चुका है और अब सिर्फ डोर-टू-डोर रोवर सर्वे जारी है जिसके लिए 71 टीमों को तैनात किया गया है जो आवासीय, व्यावसायिक, औद्योगिक और अन्य संपत्तियों का दौरा कर कब्जाधारियों की सूची तैयार करेंगी।

    राजस्व विभाग पटवारियों की मदद लेगा और तैयार किए गए डेटा का सत्यापन उनके रिकॉर्ड से किया जाएगा, जिससे असल मालिकों की पहचान में मदद मिलेगी। इसके अलावा सर्वेक्षण पूरा होने के बाद रिकॉर्ड को फाइनल करने से पहले लोगों से सुझाव और आपत्तियां भी मांगी जाएंगी ताकि अगर इनमें किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत है तो संशोधन किया जा सके। इसके लिए जिला स्तर पर राजस्व विभाग की तरफ से समितियां भी बनाई जाएंगी।

    भू-माफिया और फर्जीवाड़े पर भी लाएगी अंकुश
    यह परियोजना भू-माफिया और फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाएगी, भूमि की लूट बंद होगी और भूमि मालिक अपनी संपत्ति का पूरा ब्योरा ऑनलाइन देख सकेंगे। विभाग विवादित जमीनों के निपटारे के लिए डिजिटल व्यवस्था तैयार करेगा। साथ ही, अवैध कब्जों का पता लगाकर उन्हें हटाने में भी मदद मिलेगी। प्रत्येक संपत्ति का क्षेत्रफल दर्ज कर उसे एक यूनिक आईडी प्रदान की जाएगी, जिससे लाभार्थी का पूरा पता डिजिटल हो जाएगा और जमीन-जायदाद के झगड़ों में कमी आएगी। डिजिटल रूप से तैयार किए गए नक्शों और प्रॉपर्टी कार्डों को कानूनी मान्यता मिलेगी, जिससे संपत्ति की खरीद-बिक्री व पंजीकरण सरल होता है।

  • एमपी में सड़कों का डिजिटल सर्वेक्षण, 71210 किलोमीटर की सड़कों को किया गया माप

    एमपी में सड़कों का डिजिटल सर्वेक्षण, 71210 किलोमीटर की सड़कों को किया गया माप

    भोपाल 

     मध्यप्रदेश लोक निर्माण विभाग ने अधोसंरचना विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल करते हुए “लोक निर्माण सर्वेक्षण एप” और GIS आधारित रोड नेटवर्क मास्टर प्लान के माध्यम से कार्य प्रणाली में नवाचार का नया अध्याय जोड़ा है। विभाग ने यह महसूस किया कि सड़कों, पुलों और भवनों से संबंधित पूर्ण एवं प्रमाणिक डेटा के अभाव में योजनाओं का निर्माण अक्सर अनुमान के आधार पर करना पड़ता है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विभाग ने यह संकल्प लिया कि सुधार की शुरुआत प्रमाणिक डेटा से की जाएगी। “आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है” इस कहावत को चरितार्थ करते हुए “लोक निर्माण सर्वेक्षण एप” का विकास किया गया, जिससे विभाग की परिसंपत्तियों का वैज्ञानिक और डिजिटल सर्वे संभव हो सका। इसके अंतर्गत अब तक राज्य की 71210 किलोमीटर सड़कों का डिजिटल सर्वेक्षण कराया जा चुका है।

    ऐप के माध्यम से प्रदेश में तीन दिवसीय विशेष सड़क सर्वेक्षण अभियान संचालित किया गया, जिसमें विभाग के अभियंता स्वयं मैदान में उतरकर अपने-अपने क्षेत्रों की सड़कों का विस्तृत सर्वेक्षण करने में जुटे। सर्वेक्षण के दौरान सड़क की चौड़ाई, पेवमेंट का प्रकार, राइट ऑफ वे (ROW), शोल्डर तथा सड़क की वर्तमान स्थिति सहित विभिन्न तकनीकी मापदंडों का डिजिटल रूप से डेटा संकलित किया गया।

    2975 शासकीय भवनों तथा 1426 पुलों का सर्वे भी किया
    व्यापक सर्वेक्षण में अब तक 71,210 किलोमीटर से अधिक सड़कों का डिजिटल सर्वेक्षण किया जा चुका है। इसके साथ ही 2975 शासकीय भवनों तथा 1426 पुलों का सर्वे भी किया गया है। इस प्रक्रिया के दौरान नगरीय निकाय, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा अन्य एजेंसियों की सड़कों के साथ लोक निर्माण विभाग की सड़कों की सीमाएं भी स्पष्ट रूप से चिन्हित की गई हैं। इससे विभाग के पास अपनी प्रत्येक परिसंपत्ति का अद्यतन, डिजिटल और प्रमाणिक डेटा उपलब्ध हो गया है, जिसके आधार पर अब निर्णय अनुमान के बजाय तथ्यात्मक आधार पर लिए जा सकेंगे।

    प्रमाणिक GIS आधारित डेटा उपलब्ध होने के बाद विभाग ने समग्र रोड नेटवर्क प्लानिंग की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। पहले योजनाएं पारंपरिक पद्धति से कागजों पर तैयार की जाती थीं, किंतु अब पहली बार भास्कराचार्य संस्थान के तकनीकी सहयोग से विभाग के इंजीनियरों द्वारा प्रधानमंत्री गति शक्ति पोर्टल पर GIS आधारित रोड नेटवर्क मास्टर प्लान तैयार किया गया है। इसके लिए एक विशेष “मास्टर प्लान मॉड्यूल” विकसित किया गया है, जिसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की कनेक्टिविटी का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सकता है। इस मॉड्यूल के जरिए यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि किन पर्यटन स्थलों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने की आवश्यकता है।

    लोक निर्माण विभाग की यह पहल केवल एक योजना नहीं बल्कि प्रदेश के अधोसंरचना विकास के लिए तकनीक आधारित दीर्घकालिक दृष्टि का परिचायक है। GIS, डेटा एनालिटिक्स और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से भविष्य में सड़क निर्माण और उन्नयन की योजनाएं अधिक वैज्ञानिक, पारदर्शी और प्रभावी बनेंगी। यह पहल प्रदेश में तकनीक आधारित सुशासन और सुदृढ़ अधोसंरचना विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रही है।