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  • मोहनजीत शेरों केस: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का पंजाब पुलिस को समन, DGP को दस्तावेजों के साथ दिल्ली बुलाया

    मोहनजीत शेरों केस: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का पंजाब पुलिस को समन, DGP को दस्तावेजों के साथ दिल्ली बुलाया

    चंडीगढ़ 

    राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने सिख युवक मोहनजीत सिंह शेरों से जुड़े कथित पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले में कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने पंजाब के पुलिस महानिदेशक को नई दिल्ली तलब किया है।

    इस संबंध में औपचारिक पत्र जारी करते हुए आयोग ने पंजाब के डीजीपी को 14 अक्तूबर 2026 की दोपहर 12 बजे नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में पेश होने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, पंजाब पुलिस को इस पूरे मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड और दस्तावेज भी साथ लाने को कहा गया है। इस कार्रवाई की जानकारी भाजपा नेता दामन बाजवा और हरमनदेव सिंह बाजवा ने साझा की। 

    क्या है पूरा मामला
    पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के गांव शेरों में आयोजित 'लोक मिलनी' (जनसंवाद) कार्यक्रम के दौरान मोहनजीत सिंह शेरों ने विरोध स्वरूप काला कपड़ा दिखाया था और इलाके में बेधड़क चल रहे नशे के कारोबार का मुद्दा उठाया था। आरोप है कि इस घटना के बाद चार पुलिस अधिकारियों ने हिरासत के दौरान मोहनजीत सिंह के साथ बर्बरता की और उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई। इसी शिकायत पर कार्रवाई करते हुए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने पंजाब पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी को तलब किया है। 

  • विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब को मिलेगा नया स्थायी DGP, गौरव यादव की नियुक्ति लगभग तय

    विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब को मिलेगा नया स्थायी DGP, गौरव यादव की नियुक्ति लगभग तय

    चंडीगढ़
     पंजाब विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले राज्य को स्थायी पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) मिलना लगभग तय हो गया है। 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी गौरव यादव को नियमित डीजीपी नियुक्त किया जा रहा है।इसके साथ ही पिछले चार साल से कार्यवाहक डीजीपी के सहारे चल रही पंजाब पुलिस को स्थायी प्रमुख मिलने का रास्ता साफ हो गया है। गौरव यादव जुलाई 2022 से कार्यवाहक डीजीपी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। हालांकि, उनकी नियुक्ति का औपचारिक आदेश जारी होना अभी बाकी है।

    स्थायी डीजीपी की नियुक्ति के लिए पंजाब सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को 14 आइपीएस अधिकारियों के नाम भेजे थे। आयोग ने इन नामों पर विचार करने के बाद तीन अधिकारियों का पैनल राज्य सरकार को भेजा था।

    इसमें गौरव यादव के अलावा शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू के नाम शामिल हैं। तीनों अधिकारी 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं। मुख्यमंत्री की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद गौरव यादव के नाम पर अंतिम मुहर लगने की संभावना सबसे अधिक है।

    चार साल से अतिरिक्त प्रभार के तहत संभाल रहे थे जिम्मेदारी
    गौरव यादव जुलाई 2022 से पंजाब पुलिस के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उस समय से उन्हें कार्यवाहक डीजीपी के तौर पर तैनात किया गया था। राज्य में स्थायी डीजीपी की नियुक्ति का मामला लंबे समय तक लंबित रहा। इस दौरान पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी अतिरिक्त प्रभार के तहत चलती रही। अब मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।

    पैनल में शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू भी शामिल
    यूपीएससी की ओर से भेजे गए तीन अधिकारियों के पैनल में शरद सत्य चौहान और हरप्रीत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं। शरद सत्य चौहान 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं और पंजाब में सतर्कता प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मार्च 2028 को निर्धारित है।

    वहीं, हरप्रीत सिंह सिद्धू भी 1992 बैच के आइपीएस अधिकारी हैं और विशेष डीजीपी के पद पर तैनात हैं। उनकी सेवानिवृत्ति 31 मई 2027 को होनी है।

    हाई कोर्ट ने 13 अक्टूबर तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट
    स्थायी डीजीपी की नियुक्ति में देरी का मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है। अधिवक्ता निखिल थमन की ओर से दायर जनहित याचिका में लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार के तहत पुलिस प्रमुख की जिम्मेदारी दिए जाने पर सवाल उठाए गए थे।

    यूपीएससी से पैनल मिलने के बाद भी नियुक्ति का फैसला लंबित रहा। अब हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट देने की समयसीमा दी है।

    मुख्यमंत्री भगवंत मान की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद इस समयसीमा से पहले नियुक्ति की औपचारिक घोषणा होने की संभावना है। आदेश जारी होने पर गौरव यादव नियमित डीजीपी के तौर पर पंजाब पुलिस की कमान संभालेंगे। इससे चार साल से अधिक समय से चली आ रही कार्यवाहक डीजीपी की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

     

  • MP पुलिस की नई सोशल मीडिया गाइडलाइन, रील से कमाई और गोपनीय जानकारी शेयर करने पर सख्ती

    MP पुलिस की नई सोशल मीडिया गाइडलाइन, रील से कमाई और गोपनीय जानकारी शेयर करने पर सख्ती

    भोपाल 
     मध्य प्रदेश पुलिस में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर पुलिस मुख्यालय ने सख्त गाइडलाइन जारी की है. डीजीपी कैलाश मकवाना के निर्देश पर जारी 24 बिंदुओं की इस गाइडलाइन में पुलिसकर्मियों के फेसबुक, वॉट्सएप, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम तय किए गए हैं. अब वर्दी में रील बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करना, सरकारी संसाधनों का निजी प्रचार के लिए इस्तेमाल करना और संवेदनशील सरकारी जानकारी को सोशल मीडिया या AI टूल्स पर साझा करना अनुशासनात्मक कार्रवाई का कारण बन सकता है। 

    वर्दी में रील और फोटो डालना पड़ेगा भारी
    नई गाइडलाइन के मुताबिक पुलिस अधिकारी या कर्मचारी ड्यूटी के दौरान या ड्यूटी के बाद वर्दी अथवा अशोभनीय वेशभूषा में रील, फोटो, वीडियो या अन्य सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर सकेंगे. वर्दी का इस्तेमाल व्यक्तिगत छवि बनाने या सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने के लिए करने पर कार्रवाई हो सकती है. डीजीपी के आदेश के बाद PHQ ने पुलिसकर्मियों को सरकारी वाहन, कार्यालय, आवास, वर्दी और अन्य सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल निजी प्रचार के लिए नहीं करने के निर्देश दिए हैं. पुराने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी पुलिसकर्मियों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। 

    सोशल मीडिया से कमाई पर भी नियम
    गाइडलाइन में सोशल मीडिया से होने वाली कमाई को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रावधान किया गया है. बिना शासन की अनुमति के पुलिसकर्मी सोशल मीडिया के जरिए आय अर्जित नहीं कर सकेंगे. पेड प्रमोशन, स्पॉन्सरशिप या किसी कंपनी, प्रोडक्ट, सर्विस या कारोबार का पैसे लेकर प्रचार करने पर भी रोक रहेगी. जिन पुलिसकर्मियों ने पहले सोशल मीडिया के जरिए आय अर्जित की है, उन्हें निर्धारित अवधि में अपनी कमाई की जानकारी विभाग को देनी होगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके लिए 30 दिन की समयसीमा तय की गई है। 

    परिवार के किसी सदस्य के सोशल मीडिया अकाउंट से ऐसी आय होने की स्थिति में भी इसकी जानकारी विभाग को देने का प्रावधान है। 

    AI टूल्स को लेकर भी डीजीपी की गाइडलाइन
    सोशल मीडिया के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स के इस्तेमाल को लेकर भी पुलिस मुख्यालय ने विशेष सावधानी बरतने को कहा है. किसी भी तरह के विभागीय डॉक्यूमेंट्स को एआई टूल्स पर अपलोड करने की मनाही है. इसी तरह सरकारी गोपनीय जानकारी को सोशल मीडिया पर शेयर करने पर भी रोक रहेगी. पुलिस से जुड़ी संवेदनशील जानकारी के लीक होने की आशंका को देखते हुए यह प्रावधान खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके अलावा पुलिसकर्मी संवेदनशील ड्यूटी के दौरान अपनी लोकेशन, तैनाती स्थल और ड्यूटी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सोशल मीडिया पर साझा नहीं कर सकेंगे। 

    VIP ड्यूटी के दौरान फोटो पोस्ट, सेल्फी पर पाबंदी
    नई गाइडलाइन के मुताबिक VIP-VVIP सुरक्षा, महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों या संवेदनशील स्थानों पर तैनाती के दौरान फोटो या सेल्फी पोस्ट करने पर भी रोक रहेगी. हथियारों की ट्रेनिंग, ड्रिल, छापेमारी, दबिश और पुलिस की अन्य संवेदनशील कार्रवाई से जुड़े फोटो-वीडियो या किसी अन्य तरह से प्रसारण भी सोशल मीडिया पर नहीं किया जा सकता। 

    पीड़ित, आरोपी और गवाह की पहचान उजागर करने पर रोक

    पीड़ित, गवाह और आरोपियों के नाम जाहिर नहीं होंगे
    डीजीपी के आदेश में यह भी कहा गया है कि पुलिस जांच और जनसुनवाई से जुड़े मामलों में पीड़ित, गवाह, शिकायतकर्ता और आरोपी की पहचान सार्वजनिक नहीं करने के निर्देश हैं. ऐसे मामलों पीड़ितों से संबंधित फोटो या वीडियो भी सोशल मीडिया पर जारी करने से पहले आवश्यक अनुमति लेनी होगी और पहचान छिपानी होगी. खासतौर पर महिला और बाल पीड़ितों की पहचान उजागर करने वाली कोई भी जानकारी मीडिया से साझा नहीं की जा सकेगी। 

    निजी अकाउंट के लिए सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल नहीं
    पुलिसकर्मी अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट चलाने के लिए सरकारी CUG सिम, इंटरनेट, वाई-फाई, IP एड्रेस या सरकारी ई-मेल का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे. इसके अलावा निजी मोबाइल फोन में विभाग के सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट को लॉगिन करने को लेकर भी प्रतिबंध तय किए गए हैं. मकसद सरकारी डिजिटल संसाधनों और निजी सोशल मीडिया गतिविधियों को अलग रखना है। 

    उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई
    PHQ के आदेश के मुताबिक, '' सोशल मीडिया से जुड़े निर्देशों का उल्लंघन गंभीरता से लिया जाएगा. मामले की गंभीरता के आधार पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है और निलंबन तक की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है। 

  • जगदलपुर पहुंचे DGP अरुण देव गौतम, बस्तर की सुरक्षा व्यवस्था का लेंगे जायजा

    जगदलपुर पहुंचे DGP अरुण देव गौतम, बस्तर की सुरक्षा व्यवस्था का लेंगे जायजा

    जगदलपुर.

    जगदलपुर.
    नक्सल गतिविधियों पर नियंत्रण के बाद अब बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था के अगले चरण पर पुलिस का फोकस है. इसी सिलसिले में पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम जगदलपुर पहुंचे. उन्होंने बस्तर संभाग के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की. बैठक में नक्सल मुक्त हुए इलाकों की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की गई.

    मैदानी अधिकारियों से अभियान और जमीनी हालात को लेकर फीडबैक लिया गया. अब चुनौती नक्सल गतिविधियों की वापसी रोकने के साथ सामान्य व्यवस्था को मजबूत करना है. बैठक में आगामी सुरक्षा रणनीति और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई. नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस की मौजूदगी और निगरानी को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया. साथ ही सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए पुलिस की आगामी कार्ययोजना पर मंथन किया गया. डीजीपी का यह दौरा नक्सल उन्मूलन के बाद बदले सुरक्षा परिदृश्य की समीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है.

    गांवों तक पहुंचे पुलिस, विकास कार्यों पर भी नजर
    डीजीपी ने पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों को अंदरूनी इलाकों और गांवों में नियमित भ्रमण करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि, जवान क्षेत्र में जाकर स्थानीय लोगों की समस्याओं को समझें और वहां चल रहे विकास कार्यों का भी अवलोकन करें। शासन-प्रशासन के साथ समन्वय बनाकर जनता का विश्वास जीतने को पुलिसिंग की प्राथमिकता बताया।

    सरेंडर करने वालों को पुनर्वास नीति का पूरा लाभ
    बैठक में नक्सल पुनर्वास नीति के क्रियान्वयन पर भी चर्चा हुई। डीजीपी ने पात्र पुनर्वासितों को नीति के प्रावधानों के अनुसार अधिकतम लाभ दिलाने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के निर्देश दिए।

    तकनीक के इस्तेमाल और पारदर्शिता पर जोर
    सभी जिलों में तकनीक आधारित पुलिसिंग को मजबूत करने के निर्देश दिए गए। पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ आधुनिक तकनीक के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया गया।

    ये अफसर भी रहे मौजूद
    बैठक में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक नक्सल ऑपरेशन विवेकानंद सिन्हा, आईजी बस्तर बीएन मीणा, आईजी सीआरपीएफ कबीब के, आईजी बीएसएफ संजय पंत, केंद्रीय सुरक्षा बलों के डीआईजी, बस्तर, कोंडागांव और सुकमा के एसपी समेत अन्य राजपत्रित अधिकारी मौजूद रहे।

  • छत्तीसगढ़ के 6वें DGP विश्वरंजन नहीं रहे, पटना में अस्पताल में निधन

    छत्तीसगढ़ के 6वें DGP विश्वरंजन नहीं रहे, पटना में अस्पताल में निधन

    रायपुर 
    छत्तीसगढ़ पुलिस (Chhattisgarh Police) महकमे से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) विश्वरंजन का निधन हो गया है। कार्डियक (दिल से जुड़ी) समस्या के चलते पिछले करीब एक महीने से पटना के मेदांता अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। एक दिन पहले ही क्रिटिकल कंडीशन को देखते हुए उन्हें डायलिसिस पर रखा गया था। उनके निधन से पूरे छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिस अमले में शोक की लहर दौड़ गई है।

    1973 बैच के IPS, 4 साल तक संभाली CG पुलिस की कमान

    विश्वरंजन 1973 बैच के बेहद तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारी थे। मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला था। जुलाई 2007 में उन्हें छत्तीसगढ़ का छठवां DGP बनाया गया था। जुलाई 2011 तक करीब 4 साल उन्होंने इस अहम जिम्मेदारी को संभाला। नक्सल प्रभावित (Naxal-hit) इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में उनका बड़ा रोल रहा। इससे पहले वह लंबे समय तक इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर रहे और एडिशनल डायरेक्टर जैसे अहम पदों पर भी सेवाएं दीं।

    पूर्व डीजीपी विश्वरंजन की तबीयत पिछले महीने अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें पटना के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम की निगरानी में उनका इलाज किया जा रहा था।

    बताया जा रहा है कि उन्हें गंभीर कार्डियक (हृदय) संबंधी समस्या हुई थी। इसी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। इलाज के दौरान उनकी हालत गंभीर बनी रही और उन्होंने अस्पताल में ही अंतिम सांस ली।

    छत्तीसगढ़ के छठवें डीजीपी रहे विश्वरंजन

    विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के छठवें डीजीपी रहे हैं। 2007 में तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर के निधन के बाद राज्य सरकार ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी। वे लगभग चार वर्षों तक इस पद पर रहे और अपने कार्यकाल के दौरान पुलिस प्रशासन में कई अहम सुधार किए।

    उनके नेतृत्व में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया।

    आईबी में भी रहे लंबे समय तक

    1973 बैच के आईपीएस अधिकारी विश्वरंजन का प्रशासनिक अनुभव काफी व्यापक रहा है। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला था, हालांकि 2007 से पहले वे कभी छत्तीसगढ़ में पदस्थ नहीं रहे थे।

    वे लंबे समय तक इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में प्रतिनियुक्ति पर रहे और एडिशनल डायरेक्टर जैसे अहम पद भी संभाले।