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  • AI रिश्तों पर चीन ने कसी लगाम, चैटबॉट्स की इमोशनल बातचीत पर नए नियम लागू

    AI रिश्तों पर चीन ने कसी लगाम, चैटबॉट्स की इमोशनल बातचीत पर नए नियम लागू

    बीजिंग 

    आज के समय में AI सिर्फ सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं है. अब कई लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स से दोस्त, पार्टनर और यहां तक कि परिवार के सदस्य की तरह बात कर रहे हैं. लेकिन चीन ने एआई के इस इस्तेमाल को लेकर बड़ा कदम उठाया है. वहां अब ऐसे AI चैटबॉट्स पर सख्त नियम लागू किए गए हैं, जो लोगों के साथ लंबे समय तक इमोशनल रिलेशनशिप जैसा कनेक्शन बनाते हैं. आइए, जानते हैं पूरे मामले के बारे में। 

    चीन में AI रिश्तों पर नए नियम
    15 जुलाई को चीन ने ऐसे एआई चैटबॉट्स के लिए नए नियम लागू किए, जो इंसानों की तरह बातचीत करते हैं और लोगों को इमोशनल सपोर्ट देते हैं. इन नियमों का मकसद AI की वजह से होने वाली इमोशनल डिपेंडेंसी और दूसरी परेशानियों को कम करना बताया गया है। 

    इन नियमों के तहत एआई को यह साफ बताना होगा कि वह इंसान नहीं है. इसके अलावा चैटबॉट्स को हर दो घंटे में यूजर को यह भी बताना होगा कि वह कितनी देर से ऑनलाइन है। 

    AI को नहीं बढ़ानी होगी इमोशनल डिपेंडेंसी
    नए नियमों के मुताबिक एआई चैटबॉट यूजर को अपने ऊपर ज्यादा निर्भर नहीं बना सकते. उन्हें ऐसी बातें करने से भी रोका गया है, जिससे यूजर AI पर इमोशनल रूप से बहुत ज्यादा निर्भर हो जाए। 

    एआई को खुद को यूजर का सबसे करीबी या एकमात्र साथी बताने जैसी चीजों से भी बचना होगा. इसके अलावा चैटबॉट्स को आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाने या उसका संकेत देने की भी इजाजत नहीं है। 

    बच्चों के लिए और सख्त नियम
    बच्चों के लिए चीन ने इन नियमों को और सख्त रखा है. 14 साल से कम उम्र के बच्चों को इंसानों की तरह बातचीत करने वाले एआई का इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की मंजूरी चाहिए। 

    वहीं 18 साल से कम उम्र के बच्चों को AI बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड, पति-पत्नी या किसी करीबी रिश्ते वाले वर्चुअल पार्टनर का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। 

    AI कंपनियों पर जुर्माना
    अगर कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करती हैं, तो उन पर 2 लाख युआन तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. कुछ बड़ी टेक कंपनियों ने नियम लागू होने से पहले ही अपने एआई असिस्टेंट्स से कम्पैनियन फीचर्स हटा दिए थे। 

    AI दोस्त बन रहा है या अकेलापन बढ़ा रहा है?
    रिसर्च में एआई कम्पैनियन ऐप्स को लेकर चिंता भी सामने आई है. एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों के पास कम दोस्त या करीबी परिवार वाले होते हैं, उनके AI चैटबॉट इस्तेमाल करने की संभावना ज्यादा होती है. साथ ही एआई चैटबॉट के ज्यादा इस्तेमाल को अकेलेपन से भी जोड़ा गया है। 

    चीन के इस कदम ने एक बड़ी बहस शुरू कर दी है. सवाल यह है कि AI से लोगों को भावनात्मक नुकसान से बचाने के लिए कितने नियम जरूरी हैं और लोगों की निजी जिंदगी में सरकार का कितना दखल होना चाहिए। 

  • AI की रफ्तार रोकने की चर्चा के बीच ट्रंप का चीन को सख्त संदेश, टेक दुनिया में बढ़ी हलचल

    AI की रफ्तार रोकने की चर्चा के बीच ट्रंप का चीन को सख्त संदेश, टेक दुनिया में बढ़ी हलचल

     नई दिल्ली
    अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर होड़ लगातार तेज हो रही है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वह AI के विकास की रफ्तार को कम करने के पक्ष में नहीं हैं. आयरलैंड के डूनबेग में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका AI के विकास में चीन से आगे है और वह इस बढ़त को बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि AI की वैश्विक दौड़ में जो जीतेगा, वही जीतेगा। 

    ट्रंप ने माना कि AI के लिए कुछ सुरक्षा नियम यानी गार्डरेल्स जरूरी हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार किस तरह के नियम लाने की तैयारी कर रही है. AI के तेजी से विकास को लेकर चिंता जताने वालों पर ट्रंप ने कहा कि तकनीक को लेकर ऐसा सोचने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं। 

    ट्रंप बोले- AI की रफ्तार नहीं रोकना चाहते
    ट्रंप का यह बयान AI इंडस्ट्री में विकास की रफ्तार को लेकर चल रही बहस के बीच आया है. एंथ्रोपिक AI के CEO डारियो अमोडेई ने एक दिन पहले कहा था कि AI इंडस्ट्री को विकास की रफ्तार कुछ धीमी करनी चाहिए, ताकि सुरक्षा उपायों को तकनीक के साथ कदम मिलाने का समय मिल सके. एलन मस्क और ओपनAI के CEO सैम ऑल्टमैन भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक तौर पर सहमति जता चुके हैं। 

    वहीं, ट्रंप AI से जुड़े डेटा सेंटर के निर्माण के समर्थन में बने हुए हैं. अमेरिका में बड़ी टेक कंपनियां छोटे शहरों में कंप्यूटिंग डेटा सेंटर का नेटवर्क तैयार कर रही हैं. हालांकि, दोनों पार्टियों के नेता जमीन, पानी, बिजली की बढ़ती जरूरत और महंगे बिजली बिल को लेकर सवाल उठा रहे हैं। 

    चीन से मुकाबले को लेकर कोई समझौता नहीं
    ट्रंप के बयान से साफ है कि अमेरिका AI की रेस में चीन से अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है. इसी वजह से AI की विकास दर कम करने का सवाल अमेरिका के लिए अहम बन गया है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कह चुके हैं कि डेमोक्रेट्स को AI को चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए। 

    नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के निदेशक केविन हैसेट के मुताबिक, इस हफ्ते साइबर और साइंस-टेक्नोलॉजी से जुड़े अधिकारी AI की आगे की रणनीति पर बैठक कर सकते हैं. हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने भी AI के लिए कुछ सेफ्टी मेजर्स की जरूरत मानी है, लेकिन अमेरिका को AI में आगे बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। 

    इसी बहस के बीच एंथ्रोपिक के पूर्व कर्मचारी जैकब कॉक्सन ने अमेरिका और चीन से मिलकर AI विकास की रफ्तार को जिम्मेदारी से कंट्रोल करने की अपील की है. उनका डर है कि अगर दोनों देश बिना पर्याप्त सुरक्षा के एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में लगे रहे, तो यही AI रेस खतरनाक साबित हो सकती है। 

  • क्या भारत बनेगा वीटो पावर वाला देश? रूस-चीन के समर्थन के बाद UN चीफ ने दिया बड़ा संकेत

    क्या भारत बनेगा वीटो पावर वाला देश? रूस-चीन के समर्थन के बाद UN चीफ ने दिया बड़ा संकेत

    नईदिल्ली 
    दुनिया की राजनीति में भारत की ताकत लगातार बढ़ रही है और अब इसकी गूंज संयुक्त राष्ट्र के सबसे बड़े मंच पर भी सुनाई दे रही है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद में सुधार और उसके विस्तार की मांग का खुलकर समर्थन किया है. उन्होंने साफ कहा कि आज की दुनिया 1945 वाली दुनिया नहीं है. तब जो आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक तस्वीर थी, वह अब पूरी तरह बदल चुकी है. ऐसे में वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी आज की दुनिया के हिसाब से बदलनी चाहिए. सबसे खास बात यह है कि गुटेरेस ने भारत का नाम लेकर कहा कि वह सुरक्षा परिषद में विस्तार की मांग के सबसे आगे रहने वाले देशों में है. यानी जिस स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार की मांग भारत लंबे समय से करता रहा है, उसे अब एक और बड़ा अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है. मामला यहीं खत्म नहीं होता. ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भी भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका देने की मांग का समर्थन दोहराया है. दोनों देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और इनके पास अभी वीटो अधिकार भी है. ऐसे में उनका भारत के पक्ष में खड़ा होना काफी अहम माना जा रहा है। 

    वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण को सिर्फ नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला बनने की बात कही थी. गुटेरेस ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र में ज्यादा ताकत मिलेगी या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के साथ वीटो का अधिकार भी मिलेगा?

    संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने भारत की मांग को बताया अहम, दुनिया बदलने की दी दलील
    एंटोनियो गुटेरेस ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सुरक्षा परिषद के विस्तार को समय की जरूरत बताया. उनका कहना था कि मौजूदा संस्थागत ढांचा उस दुनिया को नहीं दर्शाता जिसमें हम आज रह रहे हैं. 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब वैश्विक शक्ति संतुलन अलग था. आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है. गुटेरेस ने कहा कि बदलती आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को वैश्विक संस्थाओं में भी जगह मिलनी चाहिए. उन्होंने खास तौर पर कहा कि भारत इस मांग को आगे बढ़ाने में सबसे आगे रहा है। 

    रूस-चीन ने भी भारत के लिए खोला बड़ा रास्ता
    ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में रूस और चीन ने भारत और ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन किया. घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई है. इसमें सुरक्षा परिषद को ज्यादा लोकतांत्रिक, प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और सक्षम बनाने की बात कही गई. साथ ही विकासशील देशों की सदस्यता बढ़ाने पर जोर दिया गया है. चीन और रूस ने कहा कि भारत और ब्राजील जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मामलों में ज्यादा बड़ी भूमिका मिलनी चाहिए. खासकर सुरक्षा परिषद में उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है. भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन खुद सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है। 

    भारत को अभी वीटो नहीं मिला, लेकिन रास्ता जरूर मजबूत हुआ
    यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. गुटेरेस ने यह ऐलान नहीं किया है कि भारत को तत्काल वीटो अधिकार मिलने जा रहा है. सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत को स्थायी सदस्य बनाने की मांग का समर्थन जरूर किया गया है. मौजूदा व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्य हैं चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका. इन पांचों के पास वीटो अधिकार है. यह व्यवस्था 1945 में सुरक्षा परिषद की स्थापना के समय से चली आ रही है. भारत अगर भविष्य में स्थायी सदस्य बनता है तो वीटो का सवाल अलग से तय होगा. फिलहाल बड़ा घटनाक्रम यह है कि भारत की दावेदारी को वैश्विक दक्षिण, ब्रिक्स और अब संयुक्त राष्ट्र प्रमुख की तरफ से भी मजबूत समर्थन मिलता दिख रहा है। 

    PM मोदी ने कहा- वैश्विक दक्षिण सिर्फ नियम मानने वाला नहीं
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की भूमिका को लेकर बड़ा संदेश दिया था. उन्होंने कहा था कि विकासशील देशों को सिर्फ बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं रहना चाहिए. उन्हें नियम बनाने की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. गुटेरेस के बयान को इसी दिशा में देखा जा रहा है. उनका कहना था कि दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है. ऐसी स्थिति में वैश्विक संस्थाओं में भी संतुलन और समानता दिखाई देनी चाहिए. सुरक्षा परिषद में सुधार इसी बड़े बदलाव का हिस्सा हो सकता है। 

    गुटेरेस ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर गाजा तक दुनिया के सामने रखी चुनौती

        संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सिर्फ सुरक्षा परिषद सुधार की बात नहीं की. उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद कई बड़ी चुनौतियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में विकास की रफ्तार को कई गुना बढ़ा सकती है. लेकिन इसका फायदा फिलहाल कुछ कंपनियों और कुछ देशों तक ज्यादा सीमित है. अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की खाई आय, अवसर, सुरक्षा और संप्रभुता की खाई को और बढ़ा सकती है. उन्होंने विकासशील देशों के लिए वित्तीय मदद बढ़ाने की भी बात की। 

        गुटेरेस ने जलवायु न्याय का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने विकसित देशों से अपने वादे पूरे करने की अपील की. इसके अलावा उन्होंने गाजा, मध्य पूर्व, यूक्रेन और सूडान समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति की जरूरत बताई. उनका कहना था कि सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का सम्मान करना चाहिए। 

    क्या भारत को मिलेगा वीटो? अब पूरी दुनिया की नजर इस सवाल पर
    भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की उसकी मांग नई नहीं है. अब उसे रूस और चीन का समर्थन मिला है. ब्रिक्स के मंच से भी आवाज मजबूत हुई है और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी सुरक्षा परिषद में विस्तार की जरूरत को स्वीकार किया है. लेकिन स्थायी सीट और खासकर वीटो अधिकार हासिल करना अभी लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारत की दावेदारी पहले से ज्यादा मजबूती के साथ वैश्विक मंच पर मौजूद है. दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है और इसी बदलाव में भारत अपनी भूमिका को और बड़ा करने की कोशिश कर रहा है। 

  • जिनपिंग की PLA में बड़ी सफाई! गलवान वाले कमांडर पर कार्रवाई, 2 दिग्गज जनरल भी बाहर

    जिनपिंग की PLA में बड़ी सफाई! गलवान वाले कमांडर पर कार्रवाई, 2 दिग्गज जनरल भी बाहर

    बीजिंग 

    चीन की सर्वोच्च सैन्य कमान में बड़ा फेरबदल हुआ है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली सेंट्रल मिलिट्री कमीशन यानी CMC से दो वरिष्ठ अधिकारियों झांग यूशिया (Zhang Youxia) और लियू झेनली (Liu Zhenli) को हटा दिया गया है. सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, दोनों के खिलाफ अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन के संदेह में जांच हुई थी. इन दोनों को हटाए जाने के बाद सात सदस्यों वाली CMC में अब सिर्फ दो सक्रिय सदस्य रह गए हैं, जिनमें खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हैं. यह कार्रवाई चीन की सेना में लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा मानी जा रही है. इसके अलावा चीन की टॉप राजनीतिक सलाहकार संस्था ने बुधवार को झाओ जोंगकी की सदस्यता खत्म कर दी. झाओ वेस्टर्न थिएटर कमांड के पूर्व कमांडर रहे हैं और 2020 के भारत-चीन सीमा टकराव के दौरान इसी कमांड की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। 

    शी के बाद नंबर-2 पर भी गिरी गाज
    झांग यूशिया चीन की सैन्य व्यवस्था में बेहद ताकतवर पद पर थे. वह CMC के वाइस चेयरमैन और चीन के शीर्ष राजनीतिक निकाय पोलित ब्यूरो के सदस्य थे. यानी सैन्य ढांचे में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद उनका कद बेहद बड़ा माना जाता था. दूसरे अधिकारी लियू झेनली CMC के सदस्य होने के साथ उसके ज्वाइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के प्रमुख थे. दोनों के खिलाफ कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब चीन की सेना में भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता को लेकर लगातार जांच चल रही है। 

    7 में से सिर्फ 2 सक्रिय सदस्य बचे
    झांग यूशिया और लियू झेनली को हटाने के बाद चीन की सेंट्रल मिलिट्री कमीशन में अब सिर्फ दो सक्रिय सदस्य रह गए हैं. इनमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हैं. यहां एक अहम बात समझना जरूरी है. चीन में CMC की पार्टी और देश, दोनों स्तरों पर समानांतर संरचनाएं हैं, लेकिन दोनों एक ही सैन्य संस्था की तरह काम करती हैं. शुक्रवार को हुई कार्रवाई ने देश वाली CMC में झांग और लियू के पदों को लेकर फैसला किया है. अभी तक उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी वाली CMC से औपचारिक तौर पर हटाए जाने की सार्वजनिक घोषणा नहीं हुई है। 

    12 सांसदों पर भी कार्रवाई
    मामला यहीं खत्म नहीं होता. चीन की नेशनल पीपल्स कांग्रेस की शुक्रवार को जारी अपडेटेड सूची में झांग यूशिया और लियू झेनली के नाम भी हटा दिए गए. उनके साथ 10 अन्य सांसदों के नाम भी सूची से गायब हैं. इनमें लेफ्टिनेंट जनरल झोंग शाओजुन भी शामिल हैं, जो CMC जनरल ऑफिस के पूर्व निदेशक रह चुके हैं. जनरल जू चिएनशेंग, जो चीन की स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स के पूर्व कमांडर थे, का नाम भी सूची से हटा दिया गया है. इस सूची में दक्षिणी चीन के नानचांग शहर के पूर्व मेयर गाओ शीवेन भी शामिल हैं. वह पहले चीन की सरकारी एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनी चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कॉरपोरेशन में काम कर चुके हैं। 

    2012 से चल रही है शी की ‘सफाई’
    चीन की सेना में यह कार्रवाई किसी एक दिन में शुरू हुई मुहिम का हिस्सा नहीं है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2012 में सत्ता संभालने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया था. सेना भी इस अभियान के प्रमुख निशानों में रही है. इस दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों और शीर्ष सैन्य जनरलों के खिलाफ जांच हुई, उन्हें पदों से हटाया गया और कार्रवाई की गई. पिछले महीने ही शी जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सेना में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को और गहरा करने का आह्वान किया था। 

  • चीन की भारत से रिकॉर्ड खरीदारी! एक साल में 74% उछला आयात, निर्यात को मिला बड़ा बूस्ट

    चीन की भारत से रिकॉर्ड खरीदारी! एक साल में 74% उछला आयात, निर्यात को मिला बड़ा बूस्ट

    नई दिल्ली

    हम सुनते रहे हैं क‍ि भारत चीन का माल खूब खरीदता है. उसके ब‍िना काम नहीं चल सकता. लेकिन अब कुछ उल्‍टा हो रहा है. हम चीन से अब भी तमाम सामान खरीद रहे हैं, बदले में अब चीन भी जहाजों में भरभरकर हमारा माल ले जा रहा है. इस बार तो उसने भारतीय बाजारों में जबरदस्‍त खरीददारी की है. इंड‍िया इंजीन‍ियरिंग एक्‍सपोर्ट्स की र‍िपोर्ट के मुताबिक, प‍िछले साल के मुकाबले चीन ने इस साल 74 फीसदी ज्‍यादा इंजीन‍िर‍िंग आइटम हमसे खरीदे हैं। 

    जून महीने में भारत के इंजीनियरिंग गुड्स के एक्‍सपोर्ट में शानदार 21% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इस शानदार ग्रोथ के साथ जून महीने का कुल निर्यात बढ़कर 11.48 अरब डॉलर के आंकड़े पर पहुंच गया है. इंजीनियरिंग एक्सपोर्टर्स की संस्था EEPC इंडिया ने सोमवार को बताया कि यह तेजी मुख्य रूप से चीन, अमेरिका, जर्मनी और ओमान जैसे देशों से आई भारी मांग के कारण संभव हो पाई है। 

    पिछले साल के मुकाबले दोगुनी बढ़ोत्‍तरी 
    आंकड़ों के मुताबिक, केवल चीन को होने वाले निर्यात में 74% का भारी उछाल आया है, जो 361.47 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. इससे पहले, मार्च में खत्म हुए पिछले वित्त वर्ष में भी चीन को होने वाले कुल निर्यात में करीब 37% की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई थी। 

    निर्यात में यह बढ़ोतरी भारत के व्यापार के लिए एक बड़ी राहत है. यह ग्रोथ ऐसे समय में आई है, जब लाल सागर और स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बाधित है, जिसके कारण माल ढुलाई, बीमा और रास्ते का खर्च काफी ज्यादा बढ़ गया है। 

    एक्‍सपोर्ट का एक चौथाई ह‍िस्‍सा इंजीन‍ियरिंग गुड्स का
    मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून की बात करें तो, इंजीनियरिंग निर्यात 18.09% बढ़कर 34.14 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले साल इसी दौरान 28.91 अरब डॉलर था. भारत के कुल माल निर्यात में एक-चौथाई से ज्यादा हिस्सा अकेले इंजीनियरिंग सेक्टर का ही होता है. भारतीय इंजीनियरिंग सामानों के लिए अमेरिका अभी भी दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. जून में अमेरिका को 1.95 अरब डॉलर का माल भेजा गया. वहीं, ओमान को होने वाले निर्यात में चार गुना से ज्यादा की वृद्धि हुई और यह करीब 259 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। 

    EEPC इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने बताया कि पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के संकट के बावजूद यह सेक्टर मजबूती से टिका हुआ है. उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों से हर महीने इंजीनियरिंग निर्यात 10 अरब डॉलर के पार बना हुआ है और आगे भी इसे बनाए रखने के लिए सरकारी सहयोग की जरूरत होगी। 

    सऊदी के एक्‍सपोर्ट में आई ग‍िरावट
    रिपोर्ट के अनुसार, जून में कुल 34 में से 27 इंजीनियरिंग उत्पाद श्रेणियों में पिछले साल के मुकाबले अच्छी ग्रोथ दर्ज की गई है. हालांकि, यूएई (UAE) और सऊदी अरब के निर्यात में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन तुर्की को होने वाले निर्यात में शानदार वापसी हुई है, जो पिछले साल काफी गिर गया था। 

    चीन को क्‍या एक्‍सपोर्ट करता है भारत
    भारत चीन-अमेर‍िका समेत कई देशों को अपने इंजीन‍ियरिंग गुड्स सप्‍लाई करता है.इसमें औद्योगिक मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और लौह-इस्पात शामिल हैं. इनमें कॉपर और एल्यूमीनियम जैसे मेटल से बने गुड्स शामिल हैं. इनका उपयोग चीन के इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्‍युफैक्‍चर‍िंग इंडस्‍ट्री में बड़े पैमाने पर होता है. भारत चीन को बॉयलर, IC इंजन और उनके पार्ट्स, मशीन टूल्स, इंजेक्टिंग मोल्डिंग मशीनें, और डेयरी, फूड प्रोसेसिंग और टेक्सटाइल उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी का भी निर्यात करता है। 

  • ट्रंप के बाद पुतिन की चीन यात्रा फाइनल, दुनिया के दो शक्तिशाली देशों की अहम बैठक संभव

    ट्रंप के बाद पुतिन की चीन यात्रा फाइनल, दुनिया के दो शक्तिशाली देशों की अहम बैठक संभव

    बीजिंग

    दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच कूटनीतिक गठजोड़ और मजबूत होने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तीन दिवसीय चीन यात्रा खत्म होने के तुरंत बाद, अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चीन का आधिकारिक दौरा करने वाले हैं। क्रेमलिन और चीनी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि राष्ट्रपति पुतिन 19 और 20 मई को चीन की यात्रा पर रहेंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के तुरंत बाद रूस ने ऐलान किया है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जल्द ही चीन जाएंगे. क्रेमलिन ने कहा कि यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे के तुरंत बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 19-20 मई को चीन की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। क्रेमलिन द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, राष्ट्रपति पुतिन अपनी इस यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे।

    इस बैठक का मुख्य उद्देश्य मॉस्को और बीजिंग के बीच ‘व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को और अधिक मजबूत करना’ है। दोनों शीर्ष नेता कई ‘प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों’ पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे। बातचीत के अंत में दोनों देशों के बीच एक साझा घोषणापत्र पर भी हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके अलावा, पुतिन चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग से भी मुलाकात करेंगे, जहां दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने पर गहन चर्चा होगी।

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने गुरुवार को कहा कि पुतिन की चीन यात्रा अब लगभग तय है और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत की तैयारी पूरी हो चुकी है. हालांकि उन्होंने यात्रा की सटीक तारीख नहीं बताई, लेकिन संकेत दिए कि यह दौरा जल्द होने वाला है.

    रूस और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं. पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब तक 40 से ज्यादा बार मुलाकात कर चुके हैं. दोनों नेताओं की पिछली मुलाकात सितंबर 2025 में बीजिंग में हुई थी.

    अब पुतिन की प्रस्तावित चीन यात्रा पर दुनिया की नजरें टिक गई हैं. माना जा रहा है कि इस मुलाकात में यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-चीन संबंध, ऊर्जा व्यापार और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे मुद्दों पर बड़ी रणनीति बन सकती है.

    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के हालिया चीन दौरे के दौरान भी शी जिनपिंग ने पुतिन का जिक्र किया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे के खत्म होते ही रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां फिर चर्चा में आ गई हैं. रूस ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुत जल्द चीन का दौरा करेंगे और इस यात्रा की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

  • ईरान को हथियार भेजने का आरोप: चीन के चार रहस्यमय विमान क्या लेकर पहुंचे तेहरान?

    ईरान को हथियार भेजने का आरोप: चीन के चार रहस्यमय विमान क्या लेकर पहुंचे तेहरान?

    तेहरान 

    मध्य एशिया में जारी तनाव के बीच एक नई घटना सामने आई है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करते हुए कमेंटेटर मारियो नॉफाल ने दावा किया है कि चीन के चार कार्गो विमान ईरान में गुपचुप तरीके से उतरे हैं। उन्होंने दावा किया कि लैंडिंग से पहले विमानों ने अपने ट्रांसपॉन्डर बंद कर दिए जिससे उनकी जानकारी किसी को हासिल ना हो सके। एक दिन पहले ही शी जिनपिंग ने अमेरिका से वादा किया था कि वह ईरान को हथियारों की कोई सप्लाई नहीं करेंगे।

    अब इस मामले के जानकारों कहना है कि चारों विमानों का इस तरह से लैंडिंग से पहले ट्रांसपॉन्डर बंद करना कोई तकनीकी खामी नहीं हो सकती है। हालांकि इन विमानों को लेकर ना तो ईरान की तरफ से और ना ही चीन की तरफ से कोई आधिकारिक जानकारी सामने आई है। चीन ने ईरान को किसी तरह के सहयोग देने के आरोपों को खारिज किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बुधवार को कहा कि इस तरह की रिपोर्ट एकदम झूठी हैं। चीन ने ईरान को कोई सैटलाइट हेल्प भी नहीं की है।

    मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि पड़ोसी देशों में अमेरिका के बेस ध्वस्त करने के लिए चीन उनसकी सहायता कर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने भी चीन को धमकी दी थी कि वह अगर किसी भी रूप में दखल देता है तो इसके परिणाम बहुत बुरे होंगे। एविएशन एक्सपर्ट का कहना है कि इस तरह से विमानों का ट्रांसपॉन्डर बंद कर लेना सामान्य तो नहीं है। हो सकता है कि किसी ऑपरेशनल या फिर सुरक्षा कारणों से ऐसा किया गया हो।

    चीन का क्या कहना है?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन ने ईरान को मिलिट्री सपोर्ट देने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बुधवार को साफ कहा कि सैटेलाइट जानकारी देने का दावा ‘पूरी तरह मनगढ़ंत’ हैं और अगर अमेरिका ने इन आधारहीन आरोपों के आधार पर कोई कार्रवाई की, तो जवाब दिया जाएगा. दूसरी तरफ, अमेरिका पहले ही संकेत दे चुका है कि अगर कोई देश ईरान की सैन्य मदद करता पाया गया, तो उसके खिलाफ आर्थिक कदम उठाए जा सकते हैं। 

    ट्रांसपोंडर बंद करना क्या संकेत है?
    विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रांसपोंडर बंद करना असामान्य जरूर है, लेकिन हमेशा गलत इरादे का संकेत नहीं होता. कभी-कभी यह सुरक्षा या तकनीकी कारणों से भी हो सकता है. लेकिन यहां एक साथ कई विमानों का ऐसा करना और वह भी कम समय में संदेह को बढ़ाता है. इस बीच, जमीन पर कूटनीति भी जारी है. अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत फिर से शुरू होने के संकेत हैं और लेबनान सीजफायर के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य भी आंशिक रूप से खुल चुका है। 

    जानकारों का कहना है कि लगातार कई विमानों का एक ही पैटर्न पर लैंड करना संदेह बढ़ाता है। अमेरिका और इजरायल के बीच थोड़ा तनाव इस बात से कम होता नजर आ रहा है कि दोनों ही देशों ने दावा किया है कि कमर्शल जहाजों के लिए होर्मुज को खोल दिया गया है। ट्रंप ने कहा कि होर्मुज सभी जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। हालांकि ईरान के लिए उनकी नाकेबंदी जारी रहेगी।

    वाशिंगटन और तेहरान ने 7 अप्रैल को दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की। इस्लामाबाद में हुई बाद की बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। हालांकि शत्रुता की पुनः शुरुआत की कोई घोषणा नहीं की गई, लेकिन अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी शुरू कर दी। अब वार्ता और युद्ध को लेकर एक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। होर्मुज की खबर आने के बाद वैश्विक बाजार में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है।