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  • जेल बदलना चाहता है आतंकी हवारा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामला संवेदनशील; IB की राय के बाद होगा फैसला

    जेल बदलना चाहता है आतंकी हवारा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामला संवेदनशील; IB की राय के बाद होगा फैसला

     चंडीगढ़
     सुप्रीम कोर्ट ने  दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्या कांड के दोषी जगतार सिंह हवारा की याचिका पर खुफिया ब्यूरो (IB) से राय मांगे। याचिका में हवारा ने खुद को दिल्ली की तिहाड़ जेल से पंजाब की किसी भी जेल में स्थानांतरित करने की मांग की है। बब्बर खालसा का यह आतंकी 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री की हत्या से जुड़े मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।

    जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा कि ये संवेदनशील मामले हैं और वह राज्य सरकार की सलाह के खिलाफ जाने की स्थिति में नहीं है। दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि हवारा जेल ब्रेक (जेल भागने) की घटना में शामिल था और इस हत्या के मामले में उसकी मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था।
    यह तर्क देते हुए कि स्थानांतरण से उसके भागने की संभावना बढ़ सकती है, भाटी ने उच्च जोखिम वाले कैदियों के स्थानांतरण पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक एडवाइजरी का हवाला दिया। उन्होंने पंजाब सरकार द्वारा दायर एक हलफनामे का भी संदर्भ दिया और कहा कि यदि उसे स्थानांतरित किया जाता है तो पंजाब में कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होगी। भाटी ने यह भी कहा कि हवारा को चंडीगढ़ जेल में सुरंग खोदने के एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है।

    हवारा के वकील ने दिया मां का हवाला

    हवारा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने दलील दी कि जब यह हत्याकांड हुआ था तब हवारा महज 21 साल का था और मुख्यमंत्री की हत्या को 31 साल बीत चुके हैं। गोंसाल्वेस ने कहा, "मेरी (हवारा की) मां बहुत बुजुर्ग हैं, वे 82 वर्ष की हैं और उनकी हालत गंभीर है। वह पंजाब की उच्च सुरक्षा वाली जेल में स्थानांतरण की मांग कर रहे हैं, न कि रिहा होने की।" उन्होंने आगे कहा कि जेल में उनका आचरण बेदाग रहा है।

    इस पर शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की-

        जब आपकी कोई विचारधारा होती है.. तो हम नहीं जानते कि यह कैसे बाहर आएगी… हर पापी का एक भविष्य होता है.. देखिए, लोग कहते हैं कि यदि आप एक व्यक्ति की हत्या करते हैं तो आप हत्यारे हैं और यदि आप 1,000 लोगों की हत्या करते हैं तो आप विजेता हैं। तो यही अंतर है। वह (हवारा) शायद शांत हो गया हो और बदला हुआ इंसान बन गया हो, लेकिन उसके बाद क्या चीज उसे भड़का दे, यह हम नहीं कह सकते।

    शीर्ष अदालत ने इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

    पिछले साल 27 सितंबर को शीर्ष अदालत ने हवारा की याचिका पर केंद्र, चंडीगढ़ प्रशासन और दिल्ली व पंजाब सरकारों को नोटिस जारी किया था। हवारा 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ स्थित नागरिक सचिवालय के प्रवेश द्वार पर हुए विस्फोट से जुड़े मामले में ताउम्र कैद की सजा काट रहा है, जिसमें बेअंत सिंह और 16 अन्य लोग मारे गए थे।

    शीर्ष अदालत में दायर याचिका में कहा गया है कि जेल में हवारा का व्यवहार 22 जनवरी 2004 की जेल ब्रेक घटना को छोड़कर निष्कलंक रहा है, जब वह भाग गया था और बाद में उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया था। याचिका में कहा गया है कि उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल से पंजाब की किसी अन्य जेल में स्थानांतरित किया जाना चाहिए क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी में उसके खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है।

    2004 जेल ब्रेक कांड में भी आया नाम

    हवारा, परमजीत सिंह भियोरा, तारा और हत्या के दोषी देवी सिंह जनवरी 2004 में लगभग 100 फीट लंबी सुरंग खोदकर चंडीगढ़ की उच्च सुरक्षा वाली बुरैल जेल से भाग गए थे। हवारा और भियोरा को अगले दो वर्षों के भीतर फिर से गिरफ्तार कर लिया गया था। इस मामले में भगोड़ा घोषित तारा को थाईलैंड से गिरफ्तार किया गया था, जबकि देवी सिंह फरार है और उसे भी भगोड़ा घोषित किया गया है।

    याचिका में कहा गया, "याचिकाकर्ता (हवारा) वर्तमान में पंजाब राज्य में दर्ज एक मामले में अपने पूरे जीवनकाल के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहा है… वह पंजाब राज्य के फतेहगढ़ साहिब जिले का मूल निवासी है और उसे पंजाब की ही जेल में रखा जाना चाहिए।"

    याचिकाकर्ता पर 36 मामले दर्ज हुए

    याचिका के अनुसार, बेअंत सिंह की हत्या के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ 36 झूठे मामले दर्ज किए गए थे और एक को छोड़कर बाकी सभी में उसे बरी कर दिया गया है। याचिका में यह भी कहा गया कि इसी मामले में दोषी ठहराए गए और जेल ब्रेक का हिस्सा रहे एक अन्य व्यक्ति को तिहाड़ से चंडीगढ़ की जेल में स्थानांतरित कर दिया गया है।

    याचिका में तर्क दिया गया, "केवल यह तथ्य कि याचिकाकर्ता को वर्षों पहले उच्च जोखिम वाला कैदी माना गया था, आज उसे दिल्ली में रखने और पंजाब स्थानांतरित न करने का पर्याप्त कारण नहीं है।" इसमें यह भी जोड़ा गया कि उसकी बेटी पंजाब में ही रहती है।

    2007 में सुनाई गई थी मौत की सजा

    याचिका में कहा गया, "इस मामले में जो प्रश्न उठता है वह यह है कि क्या एक व्यक्ति, जिस पर गंभीर सामाजिक उथल-पुथल के संदर्भ में हत्या करने का आरोप लगा था—जहां तत्कालीन मृत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के निर्देशों पर राज्य पुलिस द्वारा हजारों युवा सिखों को न्यायेतर तरीके से मार दिया गया था, और जिसके अपराध को उसके असफल जेल ब्रेक के प्रयास से और गंभीर मान लिया गया। लेकिन जिसने पिछले 19 वर्षों से जेल में जीवन व्यतीत किया है, क्या वह इस अदालत से पंजाब की जेल में स्थानांतरण के आदेश की मांग कर सकता है?"

    मार्च 2007 में एक ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में हवारा को मौत की सजा सुनाई थी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2010 में उसकी सजा को उम्रकैद में बदलते हुए निर्देश दिया था कि उसे शेष जीवन तक जेल से रिहा नहीं किया जाएगा। हवारा की याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उसके साथ-साथ अभियोजन पक्ष द्वारा दायर की गई अपीलें भी शीर्ष अदालत में लंबित हैं।

  • राजोआना को फांसी या उम्रकैद? केंद्र ने SC में सजा कम करने का विरोध किया, 28 को होगी सुनवाई

    राजोआना को फांसी या उम्रकैद? केंद्र ने SC में सजा कम करने का विरोध किया, 28 को होगी सुनवाई

    नई दिल्ली
    केंद्र सरकार ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में हुई हत्या के मामले में मौत की सजा पाए दोषी बलवंत सिंह राजोआना की उस याचिका का विरोध किया है जिसमें उन्होंने अपनी सजा को कम करने की मांग की है।30 से अधिक वर्षों से हिरासत में रह रहे राजोआना ने राष्ट्रपति के समक्ष 2012 से लंबित दया याचिका पर निर्णय में देरी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

    केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया, “हमें उनकी मांगों पर आपत्ति है। राज्य [पंजाब] में मौजूदा स्थिति को देखते हुए, कोई भी निर्णय लेना उचित नहीं होगा।”

    केंद्र सरकार द्वारा याचिका का विरोध किए जाने के मद्देनजर, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और अपारेश कुमार सिंह सहित पीठ ने कहा कि वह मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर करेगी।"चूंकि अब वे अपनी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने पर जोर दे रहे हैं, जिसका आप विरोध कर रहे हैं, इसलिए हम मामले की योग्यता के आधार पर सुनवाई करेंगे," पीठ ने कहा।श्री नटराज द्वारा मामले की तैयारी के लिए समय मांगे जाने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई 28 अक्टूबर को तय की।

    बब्बर खालसा के उग्रवादी राजोआना को तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में उनकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था। बेअंत सिंह की हत्या 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा सिविल सचिवालय के बाहर एक आत्मघाती बम विस्फोट में हुई थी। इस विस्फोट में हमलावर दिलावर सिंह और 17 अन्य लोग भी मारे गए थे।

    एक विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में रजोआना को मृत्युदंड सुनाया था, जिसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2010 में बरकरार रखा था। उनकी फांसी 31 मार्च, 2012 को तय की गई थी, लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) द्वारा उनकी ओर से दया याचिका प्रस्तुत करने के बाद इसे स्थगित कर दिया गया था।

    14 साल से राष्ट्रपति के पास लंबित है दया याचिका
    राजोआना की याचिका का मुख्य आधार उसकी दया या
    चिका पर लंबे समय से फैसला नहीं होना है। राजोआना की ओर से दलील दी गई है कि उसकी दया याचिका वर्ष 2012 से राष्ट्रपति के पास लंबित है।

    14 साल से अधिक समय तक फांसी की सजा के अनिश्चित भविष्य में रहने से उसे मानसिक पीड़ा और असहनीय तनाव का सामना करना पड़ा है। याचिका में कहा गया है कि दया याचिका पर फैसला लेने में इतनी लंबी देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है।

    राजोआना के वकील की ओर से सुप्रीम कोर्ट के उन पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया जाएगा, जिनमें दया याचिका पर अत्यधिक देरी को मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने के आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। 23 सितंबर को वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राजोआना अब मुख्य रूप से मृत्युदंड को उम्रकैद में बदलने के मुद्दे पर जोर दे रहा है।

    31 अगस्त 1995 को हुआ था बम विस्फोट
    बलवंत सिंह राजोआना को 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ स्थित पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर हुए आत्मघाती बम विस्फोट मामले में दोषी ठहराया गया था। इस विस्फोट में तत्कालीन पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की मौत हुई थी। जांच में राजोआना को मामले में बैकअप बम हमलावर बताया गया था।

    विशेष अदालत ने जुलाई 2007 में राजोआना को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 2010 में उसकी सजा को बरकरार रखा। राजोआना को 31 मार्च 2012 को फांसी दी जानी थी, लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की ओर से उसकी ओर से दया याचिका दाखिल किए जाने के बाद फांसी पर रोक लगा दी गई। इसके बाद से उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है।

    2019 में केंद्र ने रखा था सजा कम करने का प्रस्ताव
    राजोआना की सजा को लेकर वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने भी पहल की थी। गृह मंत्रालय ने गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती के अवसर पर राजोआना की मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि यह प्रस्ताव औपचारिक रूप से लागू नहीं हो सका।

    इसके बाद राजोआना ने वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और केंद्र के प्रस्ताव को लागू करने के साथ-साथ उसकी दया याचिका पर फैसला करने की मांग की। इस दौरान केंद्र ने अदालत को बताया था कि मामले में फैसला टाल दिया गया है। दया याचिका पर लंबे समय से फैसला नहीं होने के कारण यह मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया है।

    पंजाब के मौजूदा माहौल का दिया हवाला
    इस बार केंद्र ने राजोआना की सजा कम करने का स्पष्ट रूप से विरोध किया है। केंद्र का ताजा रुख ऐसे समय आया है जब पंजाब में राजनीतिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे संवेदनशील बने हुए हैं।

    हालांकि, केंद्र ने अदालत के समक्ष मौजूदा परिस्थितियों का हवाला देते हुए सजा कम करने को अनुकूल नहीं बताया है। अब सुप्रीम कोर्ट 28 अक्टूबर को केंद्र के विरोध और राजोआना की ओर से सजा में देरी को आधार बनाकर दायर याचिका पर विस्तार से सुनवाई करेगा।

     

  • बेअंत सिंह हत्याकांड के दोषी जगतार की पैरोल को लेकर AAP विधायक सक्रिय, मां से की मुलाकात

    बेअंत सिंह हत्याकांड के दोषी जगतार की पैरोल को लेकर AAP विधायक सक्रिय, मां से की मुलाकात

    फतेहगढ़ साहिब.

    आम आदमी पार्टी श्री चमकौर साहिब से विधायक डॉ. चरणजीत सिंह ने फतेहगढ़ साहिब जिले के अधीन आती खमानों तहसील के गांव हवारा कलां पहुंचकर जगतार सिंह हवारा की बुजुर्ग व बीमार माता नरिंदर कौर से मुलाकात की।

    जगतार सिंह हवारा हत्या मामले में दिल्ली की मंडोली जेल में सजा काट रहा है। माता की नाजुक स्थिति को देखते हुए विधायक ने गहरी संवेदना व्यक्त की और कहा कि एक मां की अपने बेटे से मिलने की तड़प और दर्द को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। डॉ. चरणजीत सिंह ने बताया कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने खुद पंजाब के राज्यपाल से मुलाकात कर और केंद्र सरकार को पत्र भेजकर जगतार सिंह हवारा को कम से कम 10 दिनों की पैरोल देने की पुरजोर मांग की है, ताकि अपनी बीमार मां की देखभाल कर सकें। उन्होंने कहा कि इंसानियत और मानवाधिकारों के नाते हवारा को तुरंत पैरोल मिलनी चाहिए। इस अवसर पर विधायक ने माता जी के स्वास्थ्य और दीर्घायु होने की प्रार्थना भी की।

    विधानसभा सत्र में भी उठा पैरोल का मुद्दा
    पंजाब विधानसभा के वर्तमान सत्र के दौरान भी जगतार सिंह हवारा को पैरोल दिए जाने की मांग उठी थी। गौरतलब है कि हवारा को 1995 के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने 2007 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में अक्टूबर 2010 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया था।

    बेअंत सिंह हत्याकांड से संबंध
    जगतार सिंह हवारा पूर्व में वॉलीबॉल के कुशल खिलाड़ी रहे हैं। 31 अगस्त 1995 को पंजाब और हरियाणा सचिवालय के बाहर हुए एक भीषण बम धमाके में पंजाब के तत्कालीन 12वें मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की मृत्यु हो गई थी। इस घटना में पंजाब पुलिस के एक सिपाही सहित 17 लोगों की जान गई थी। इस वारदात को दिलावर सिंह ने मानव बम बनकर अंजाम दिया था, जिसमें हवारा और बलवंत सिंह राजोआणा को मुख्य साजिशकर्ता ठहराया गया था।