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  • वारिस पंजाब दे को खतरा बताने पर अकाली दल का पलटवार, अयाली-खालसा ने उठाए सवाल

    वारिस पंजाब दे को खतरा बताने पर अकाली दल का पलटवार, अयाली-खालसा ने उठाए सवाल

    चंडीगढ़.

    अकाली दल ‘वारिस पंजाब दे’ को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताए जाने पर पार्टी के वरिष्ठ नेता सरदार मनप्रीत सिंह अयाली और सांसद भाई सरबजीत सिंह खालसा ने कड़ा एतराज जताया है।

    पार्टी की मान्यता और चुनाव संबंधी विवाद को लेकर हाई कोर्ट में चल रही कार्रवाई के दौरान पार्टी को सुरक्षा के लिए खतरा बताए जाने पर नेताओं ने इसे सिख कौम और उसकी राजनीतिक आवाज को लेकर गंभीर टिप्पणी करार दिया।

    सिख कौम ने देश की आजादी के लिए दी है कुर्बानियां
    दोनों नेताओं ने मंगलवार को पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर पार्टी के खिलाफ की जा रही कार्रवाई रोकने की मांग की। नेताओं ने कहा कि सिख कौम ने देश की आजादी से लेकर उसकी सुरक्षा तक में बड़ी कुर्बानियां दी हैं।

  • पंजाब में बदला पंथक वोट का मिजाज, अकाली दल कमजोर; BJP से भी नहीं बन रही बात

    पंजाब में बदला पंथक वोट का मिजाज, अकाली दल कमजोर; BJP से भी नहीं बन रही बात

     जालंधर 

    पंजाब में अकाली दल के सामने पंथक वोट बैंक को एकजुट करने की बड़ी चुनौती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का मत प्रतिशत घटकर महज 13.42 फीसदी रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल तीन सीटें मिली थीं। यह गिरावट 2017 के बाद से लगातार जारी है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में उसकी पकड़ कमजोर हुई है। पार्टी को अब अपने बिखरे हुए राजनीतिक आधार को फिर से संगठित करना होगा।

    अकाली दल को 2014 में 26.30 फीसदी और 2019 में 27.45 फीसदी वोट मिले थे लेकिन 2024 में यह आंकड़ा 13.42 फीसदी पर आ गया जिससे पार्टी सिर्फ बठिंडा लोकसभा सीट जीत सकी। इस बीच, सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) को 2024 में करीब 3.82 फीसदी वोट मिले। 

    निर्दलीय उम्मीदवार अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा की जीत ने भी पंथक वोटों के बिखराव को दर्शाया। इन नतीजों से स्पष्ट है कि अकाली दल से दूर हुआ पंथक वोट कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या भाजपा के पास पूरी तरह नहीं गया बल्कि इसका एक हिस्सा नई पंथक राजनीति की ओर मुड़ गया है। सुखबीर बादल के नेतृत्व वाला अकाली दल अपने पुराने संगठन को बचाने का प्रयास कर रहा है। वहीं पुनर्सुरजीत धड़ा और वारिस पंजाब दे जैसे समूह भी अपनी पहचान बना रहे हैं। यह स्थिति अकाली राजनीति के सामने विरोधी दलों से भी बड़ी चुनौती पेश करती है।

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान संकट
    1966 में नए पंजाब के गठन के बाद अकाली दल ने क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत जगह बनाई। पार्टी ने 1977, 1985, 1997, 2007 और 2012 में सत्ता हासिल की। हालांकि, 2017 के बाद से इसके चुनावी प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी तीन सीटों तक सिमट गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में मत प्रतिशत में भारी कमी ने इस संकट को और गहरा किया है।

    नई पंथक राजनीति की ओर गया वोट
    अकाली दल का वोट बैंक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसका एक बड़ा हिस्सा अब अलग-अलग पंथिक राजनीतिक धाराओं में बंट गया है। सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) को 2024 में 3.82 फीसदी वोट मिले। निर्दलीय उम्मीदवार अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा की जीत भी इसी बदलाव का संकेत है। यह दर्शाता है कि पंथिक वोट राष्ट्रीय दलों के बजाय नई पंथक राजनीति की ओर भी गया है।

    पुराने गठबंधन की चर्चाएं
    भाजपा और अकाली दल के पु
    राने गठबंधन को लेकर पंजाब की राजनीति में चर्चाएं जारी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 18.56 फीसदी और अकाली दल को 13.42 फीसदी वोट मिले थे। दोनों के मत प्रतिशत को जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 31.98 फीसदी होता है। हालांकि, वोटों का शत-प्रतिशत हस्तांतरण हमेशा संभव नहीं होता है। सितंबर 2026 तक भाजपा ने सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कही है। 2027 के चुनाव से पहले अकाली दल को अपने बिखरे आधार को एकजुट करना होगा।