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  • AIIMS Bhopal News: 8 घंटे चली सर्जरी रही सफल, आधुनिक चिकित्सा से ट्रांसजेंडर महिला को मिली नई शुरुआत

    AIIMS Bhopal News: 8 घंटे चली सर्जरी रही सफल, आधुनिक चिकित्सा से ट्रांसजेंडर महिला को मिली नई शुरुआत

    भोपाल
     अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल में डॉक्टरों की टीम ने एक ट्रांसजेंडर महिला की जटिल बॉटम सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की है। सरकारी अस्पताल में इस तरह की यह पहली सर्जरी बताई जा रही है। करीब आठ घंटे तक चले ऑपरेशन के जरिए मरीज के शरीर को उनकी लैंगिक पहचान के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया पूरी की गई। सर्जरी मरीज की इच्छा, सहमति, काउंसलिंग और चिकित्सकीय जांच के बाद की गई।

    मरीज ने लगभग 14 साल तक पुरुष के रूप में जीवन बिताया, लेकिन वह स्वयं को महिला के रूप में पहचानती थीं। इसी पहचान के अनुरूप जीवन जीने की इच्छा लेकर वह एम्स भोपाल के ट्रांसजेंडर क्लीनिक पहुंचीं। यहां विशेषज्ञों ने उनकी काउंसलिंग की और जरूरी जांचों के बाद सर्जरी का निर्णय लिया।

    आठ घंटे की जटिल सर्जरी 
    एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, यह प्रक्रिया संवेदनशील होने के साथ चिकित्सकीय रूप से चुनौतीपूर्ण भी थी। विशेषज्ञों की टीम ने करीब आठ घंटे में ऑपरेशन पूरा किया। सर्जरी के बाद मरीज को निगरानी में रखा गया और उनकी सेहत में संतोषजनक सुधार होने पर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

    अस्पताल से जाते समय मरीज ने इस बदलाव पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि सर्जरी से उन्हें अपनी पहचान के अनुरूप जीवन जीने और भविष्य में अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

    इन्होंने किया ऑपरेशन
    इस सर्जरी को एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की अध्यक्ष डॉ. मनाल खान और सहायक प्राध्यापक डॉ. अभिनव सिंह ने अपनी टीम के साथ अंजाम दिया।

    ऑपरेशन में एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अनुज जैन, प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के डॉ. अरुण कुमार डोरा और यूरोलॉजी विभाग के डॉ. देवाशीष कौशल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभिन्न विभागों के विशेषज्ञों के समन्वय से यह जटिल प्रक्रिया पूरी की गई।

    एम्स में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए समर्पित क्लीनिक
    एम्स भोपाल में ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए समर्पित क्लीनिक संचालित है। यहां मरीजों को जांच, काउंसलिंग और जरूरत के अनुसार इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इस तरह की सर्जरी में मरीज की इच्छा, सूचित सहमति और चिकित्सकीय मूल्यांकन को विशेष महत्व दिया जाता है।

    क्या होती है बॉटम सर्जरी?
    बॉटम सर्जरी लैंगिक पहचान के अनुरूप शरीर के जननांगों में बदलाव करने वाली सर्जरी है। ट्रांसजेंडर महिलाओं के मामले में इसका उद्देश्य शारीरिक संरचना को उनकी लैंगिक पहचान के अनुरूप बनाना होता है। यह एक जटिल चिकित्सकीय प्रक्रिया है, जिसके लिए विशेषज्ञों की टीम, विस्तृत परामर्श और ऑपरेशन के बाद उचित देखभाल की जरूरत होती है।

        यह सर्जरी संस्थान की बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और सभी लोगों को उनकी जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य सेवाएं देने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। प्रदेश के शासकीय अस्पताल में पहली बार ऐसी सर्जरी होना संस्थान के लिए गर्व की बात है।
        – लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) डॉ. नरेंद्र कोतवाल, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल।

     

  • बाल झड़ना और नाखून टूटना सिर्फ सामान्य समस्या नहीं! AIIMS भोपाल में कैंसर समेत गंभीर बीमारियों को लेकर चेतावनी

    बाल झड़ना और नाखून टूटना सिर्फ सामान्य समस्या नहीं! AIIMS भोपाल में कैंसर समेत गंभीर बीमारियों को लेकर चेतावनी

    भोपाल

     त्वचा पर दाग, रंग में बदलाव, नाखून की असामान्यता या बालों का झड़ना सामान्य लग सकता है, लेकिन कुछ मामलों में ऐसे बदलाव के पीछे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी छिपी हो सकती है। ऐसे सूक्ष्म बदलावों की पहचान में आधुनिक तकनीक मददगार बन रही है। एम्स भोपाल में आयोजित सीएमई कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने डर्मोस्कोपी के जरिए त्वचा रोगों की बेहतर पहचान और उपचार की योजना बनाने के बारे में बताया। विशेषज्ञों ने त्वचा पर अधिक या कम रंगत, सूजन वाले और ग्रैनुलोमेटस रोग, नाखूनों की समस्याओं तथा बाल झड़ने की अलग-अलग स्थितियों में डर्मोस्कोपी के उपयोग के बारे में चर्चा की।

    डर्मोस्कोपी निभाएगी अहम भूमिका- विशेषज्ञ
    डॉ. पायल चौहान, डॉ. सौमिल खरे और डॉ. कृति दीवान ने बताया कि कैंसर से जुड़ी त्वचा संबंधी असामान्यताओं और कैंसरकारी त्वचा रोगों की पहचान में डर्मोस्कोपी भूमिका निभाएगी। संदिग्ध बदलावों की बारीकी से जांच कर आगे की चिकित्सकीय रणनीति तय करने में यह उपयोगी होगी। दैनिक क्लिनिकल प्रैक्टिस में डर्मोस्कोपी का समावेशन के बारे में भी बताया। कार्यर म में प्रोफेसर डॉ. रजनीश जोशी, डॉ. नितिन पंड्या डॉ. प्रशंसा जायसवाल और डॉ. मनीष खंडारे ने भी हिस्सा लिया।

    आंखों से न दिखने वाले बदलाव भी पकड़ में
    डर्मोस्कोपी विशेष उपकरण से त्वचा को करीब से देखने की तकनीक है। इससे त्वचा के ऐसे सूक्ष्म पैटर्न और बदलाव स्पष्ट होते हैं, जिन्हें खुली आंखों से पहचानना मुश्किल होता है। इससे डॉक्टर को बीमारी के आकलन और आगे के उपचार का निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।

    एमपी का पहला अस्पताल जिसमें होगी रोबोटिकी सर्जरी
    प्रोस्टेट, किडनी, गर्भाशय और कोलन कैंसर जैसी सर्जरी में रोबोटिक तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। इसमें परंपरागत ऑपरेशन की तुलना में छोटा चीरा लगाया जाता है। इससे रक्तस्राव और दर्द कम होने के साथ मरीज के जल्दी रिकवर होने की संभावना रहती है। दा विंची रोबोट स्थापित होने के बाद एम्स मध्य प्रदेश का पहला सरकारी अस्पताल बन जाएगा, जहां रोबोटिक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध होगी।

    त्वचा कैंसर क्या है?
    त्वचा कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें त्वचा के ऊतकों में असामान्य कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं। सामान्य तौर पर, त्वचा की कोशिकाएं बूढ़ी होकर मरने लगती हैं और उनकी जगह नई कोशिकाएं बन जाती हैं। लेकिन जब यह प्रक्रिया ठीक से काम नहीं करती तो कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं।

  • अब घर बैठे AIIMS भोपाल की 8 स्वास्थ्य सेवाएं, QR कोड से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट और जांच रिपोर्ट पाएं

    अब घर बैठे AIIMS भोपाल की 8 स्वास्थ्य सेवाएं, QR कोड से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट और जांच रिपोर्ट पाएं

    भोपाल 
    मध्यप्रदेश के भोपाल एम्स में मरीजों को अब डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेने, जांच रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी हासिल करने सहित अन्य कामों के लिए बार-बार अस्पताल आने और कतार में लगने की जरूरत नहीं होगी। एम्स ने वाट्एसेप-स्वास्थ्य सेवा शुरू की है। मरीजों को अलग मोबाइल ऐप डाउनलोड करने या किसी नए पोर्टल पर जाने की जरूरत नहीं होगी। बस क्यूआर कोड स्कैन करना होगा और हाई लिखकर ओपीडी सबमिट करना होगा। अभी इसे परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया है। संस्थान के डॉ. बाबूलाल सोनी ने बताया कि इसमें और सुधार के साथ अन्य सेवाओं को भी जोड़ा जाएगा।

    एक वाट्एसेप, कई स्वास्थ्य सेवाएं
    -इस सुविधा के जरिए मरीज मोबाइल से ओपीडी के उपलब्ध समय और स्लाट देख सकेंगे और घर बैठे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले सकेंगे। केवल डॉक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल आने वाले मरीजों को राहत मिलेगी।

    -प्रयोगशाला और अन्य नैदानिक जांचों की रिपोर्ट और अस्पताल से डिस्चार्ज होने की समरी रिपोर्ट भी वाट्एसेप पर देखी और डाउनलोड की जा सकेगी।

    -आभा पहचान संख्या बना सकेंगे और उसे उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ सकेंगे। अस्पताल द्वारा जारी जन्म और मृत्यु प्रमाण-पत्र भी इससे प्राप्त और डाउनलोड किए जा सकेंगे।

    वाट्एसेप पर प्रमुख सुविधाएं

    -ओपीडी अपॉइंटमेंट और उपलब्ध स्लाट की जानकारी
    -प्रयोगशाला व अन्य जांच रिपोर्ट देखना और डाउनलोड करना
    -डिस्चार्ज समरी प्राप्त करना
    -आभा आइडी बनाना और जोड़ना
    -जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र प्राप्त व डाउनलोड करना
    -ओपीडी व अन्य मरीज सेवाओं की जानकारी

    एम्स ने किया सफल ऑपरेशन
    बीते दिनों पहले ही एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने 52 वर्षीय मरीज के दो अलग-अलग कैंसर का एक ही ऑपरेशन में सफल उपचार किया। मरीज लगातार बढ़ते पीलिया, पूरे शरीर में खुजली और तेजी से वजन घटने की शिकायत लेकर एम्स आया था। जांच में पता चला कि कैंसर के कारण पित्त नली जाम हो गई है और दाहिनी किडनी में 6.5 सेंटीमीटर का कैंसर ट्यूमर भी है। मरीज की स्थिति को देखते हुए यूरोलॉजी और सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने संयुक्त सर्जरी की योजना बनाई। सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी टीम ने व्हिपल प्रक्रिया के जरिए पित्त नली और आसपास के कैंसरग्रस्त हिस्से को हटाया। यूरोलॉजी टीम ने राइट रेडिकल नेफ्रेक्टॉमी कर कैसरग्रस्त दाहिनी किडनी को निकाल दिया।

     

  • AIIMS रायपुर की बड़ी कामयाबी, ‘लाइलाज’ बीमारी का हुआ सफल उपचार; मरीज को मिली नई जिंदगी

    AIIMS रायपुर की बड़ी कामयाबी, ‘लाइलाज’ बीमारी का हुआ सफल उपचार; मरीज को मिली नई जिंदगी

     नामुमकिन हुआ मुमकिन, ‘लाइलाज’ समझी जा रही बीमारी का एम्स रायपुर में सफल उपचार 

     बाल आयोग की पहल और दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के सहयोग से वनवासी बचपन को मिली नई उम्मीद, स्वास्थ्य में 80 प्रतिशत सुधार 

     लंबी प्रक्रिया के बाद मिला बड़ा सुकून जनजाति बेटी के साथ हुआ न्याय 

    रायपुर

    छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की संवेदनशील पहल और निरंतर प्रयासों से गंभीर बीमारी से जूझ रही एक बालिका के जीवन में नई उम्मीद जगी है। जिस बालिका का शरीर धीरे-धीरे पत्थर जैसा होता जा रहा था और जिसकी स्थिति बेहद गंभीर थी, उसके स्वास्थ्य में एम्स रायपुर में उपचार के बाद अब लगभग 80 प्रतिशत तक सुधार हुआ है।

    बालिका की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी मिलने के बाद अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उसके बेहतर उपचार के लिए आवश्यक पहल की। उन्होंने दंतेवाड़ा कलेक्टर से चर्चा कर बालिका के उपचार, देखभाल और आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने का आग्रह किया।

    अध्यक्ष डॉ. शर्मा की पहल पर दंतेवाड़ा कलेक्टर द्वारा बालिका की देखभाल एवं आवश्यक समन्वय के लिए संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई। जिला प्रशासन ने संवेदनशीलता के साथ इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया और बालिका को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक सहयोग एवं समन्वय सुनिश्चित किया।

    इसके पश्चात बालिका को बेहतर एवं विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एम्स रायपुर में उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बालिका की गंभीर स्थिति को देखते हुए लगातार उपचार, जांच एवं आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल की।

    एम्स रायपुर में त्वचा रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यकी गांगुली तथा डॉ. नम्रता छाबड़ा सहित बहुविषयक चिकित्सा टीम ने बालिका की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया तथा उसकी आवश्यकता के अनुरूप चरणबद्ध उपचार योजना तैयार की। उपचार के दौरान त्वचा संबंधी समस्याओं के साथ-साथ बालिका के समग्र स्वास्थ्य, पोषण, संक्रमण की रोकथाम तथा अन्य संबंधित चिकित्सकीय पहलुओं पर भी निरंतर ध्यान दिया गया।

     एम्स के चिकित्सकों के अथक प्रयास, दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के सहयोग तथा अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की सतत पहल और निगरानी के परिणामस्वरूप बालिका के स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सकारात्मक बदलाव आया है। वर्तमान में उसके स्वास्थ्य में लगभग 80 प्रतिशत सुधार हो चुका है, जो उसके परिजनों और उपचार से जुड़े सभी लोगों के लिए बेहद उत्साहजनक है। 

    अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा लगातार बालिका के स्वास्थ्य की प्रगति की जानकारी लेती रहीं और संबंधित चिकित्सकों एवं अधिकारियों से समन्वय बनाए रखा। उनका उद्देश्य रहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रही इस बालिका को समय पर बेहतर उपचार, पोषण और आवश्यक देखभाल मिल सके तथा वह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौट सके।

    अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा—

    “हर बच्चे को बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है। इस बालिका के उपचार में एम्स के चिकित्सकों ने जिस समर्पण और अथक प्रयास के साथ कार्य किया है, वह अत्यंत सराहनीय है। दंतेवाड़ा कलेक्टर एवं जिला प्रशासन द्वारा भी बालिका की देखभाल के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित कर संवेदनशीलता के साथ सहयोग किया गया। बालिका के स्वास्थ्य में 80 प्रतिशत सुधार हम सभी के लिए बेहद संतोषजनक और उत्साहजनक है। हमारा प्रयास है कि वह पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौटे और उसके चेहरे की मुस्कान हमेशा बनी रहे।”

    बालिका के स्वास्थ्य में आए इस सकारात्मक बदलाव से उसके परिजनों एवं उसकी देखभाल कर रहे लोगों में खुशी का माहौल है। इस पूरे उपचार एवं देखभाल की प्रक्रिया में सहयोग देने वाले एम्स रायपुर के चिकित्सकों एवं बहुविषयक चिकित्सा टीम, अस्पताल प्रशासन, दंतेवाड़ा जिला प्रशासन तथा बालिका के उपचार के लिए निरंतर पहल करने वाली अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा के प्रयासों को सराहा जा रहा है।

    गंभीर बीमारी से जूझ रही इस बालिका के स्वास्थ्य में आया यह सुधार न केवल उसके परिवार के लिए राहत और खुशी का विषय है, बल्कि यह इस बात की भी मिसाल है कि संवेदनशील पहल, समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा, प्रशासनिक सहयोग और निरंतर प्रयासों से मुश्किल परिस्थितियों में भी उम्मीद की नई राह बनाई जा सकती है।

  • एम्स भोपाल में मप्र में पहली बार ‘मसल ट्रांसफर’ सर्जरी, जांघ की मांसपेशी से हाथ की गति में आई सुधार

    एम्स भोपाल में मप्र में पहली बार ‘मसल ट्रांसफर’ सर्जरी, जांघ की मांसपेशी से हाथ की गति में आई सुधार

    भोपाल
     एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने मध्य प्रदेश में पहली बार एक ऐसी जटिल सर्जरी को अंजाम दिया है, जिसमें शरीर के एक हिस्से की सक्रिय मांसपेशी को दूसरे हिस्से में लगाकर अंग की गति वापस लाई गई।

    'फ्री फंक्शनिंग मसल ट्रांसफर' (एफएफएमटी) नामक इस तकनीक के जरिए 55 वर्षीय एक ऐसे मरीज का हाथ सक्रिय किया गया है, जो 'पैन ब्रैकियल प्लेक्सस इंजरी' के कारण पूरी तरह लकवाग्रस्त (पैरालाइज्ड) हो चुका था।

    मरीज एक ऐसी गंभीर स्थिति से जूझ रहा था जिसमें कंधे से हाथ तक जाने वाली नसों का जाल पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके परिणामस्वरूप उसका ऊपरी अंग पूरी तरह निष्क्रिय था और वह हाथ हिलाने तक में असमर्थ था। इस स्थिति में जीवन की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है क्योंकि मरीज दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है।

    कैसे हुई जटिल माइक्रोसर्जरी?

    इस सर्जरी में मरीज की जांघ से 'ग्रैसिलिस' नामक मांसपेशी को उसकी नसों और रक्त वाहिकाओं के साथ निकाला गया। इस जीवित मांसपेशी को प्रभावित हाथ में प्रत्यारोपित किया गया। इसके बाद माइक्रोस्कोप की मदद से नसों और खून की नलियों को जोड़ा गया। इस सफल प्रक्रिया के बाद अब मरीज की कोहनी में सक्रिय लचीलापन बहाल हो सकेगा, जिससे वह हाथ मोड़ना और उठाना जैसे बुनियादी कार्य कर पाएगा।
    इन विशेषज्ञों की टीम ने रचा इतिहास

    इस ऐतिहासिक सर्जरी में बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. दीपक कृष्णा (अतिरिक्त प्रोफेसर), डॉ. राहुल दुबेपुरिया (एसोसिएट प्रोफेसर) की मुख्य भूमिका रही। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. अनुज जैन (अतिरिक्त प्रोफेसर) ने किया।

    जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध

        प्रदेश में यह अपनी तरह की पहली और बेहद जटिल प्रक्रिया है। इस उपलब्धि ने साबित किया है कि एम्स भोपाल अब दुनिया की सबसे उन्नत माइक्रोसर्जिकल तकनीकों को अपनाने में सक्षम है। हमारा लक्ष्य गरीब और जरूरतमंद मरीजों को ऐसी महंगी और जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध कराना है। – प्रो. डॉ. माधवानंद कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल।

     

  • मेडिकल ब्रिलियंस! एम्स भोपाल ने मरीज के लिए अंजाम दी दुर्लभ और जटिल ‘होल लंग्स लैवेज’ सर्जरी

    मेडिकल ब्रिलियंस! एम्स भोपाल ने मरीज के लिए अंजाम दी दुर्लभ और जटिल ‘होल लंग्स लैवेज’ सर्जरी

     भोपाल 

    पत्थर, सीमेंट और निर्माण से जुड़ी दुनिया जितनी मजबूत दिखती है, उतनी ही कमजोर जिंदगियां उसके पीछे काम कर रही होती हैं। इन्हीं जिंदगियों को धीरे-धीरे निगल लेने वाली एक खामोश और जानलेवा बीमारी है सिलिकोसिस। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें फेफड़े धीरे-धीरे पत्थर जम जाता है। 

    एम्स भोपाल में मध्य भारत की पहल

    एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने इस मरीज के इलाज के लिए ‘होल लंग्स लैवेज’ नाम की अत्यंत जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस प्रक्रिया में फेफड़ों के अंदर जमा प्रोटीन और धूल को सलाइन वाटर से धोकर बाहर निकाला जाता है। एम्स प्रबंधन के अनुसार, मध्य भारत में यह पहला मौका है, जब सिलिकोसिस से प्रभावित फेफड़ों में जमे प्रोटीन को इस तकनीक से सफलतापूर्वक साफ किया गया हो।

    डॉक्टरों का कहना है कि यह सिर्फ एक मरीज का इलाज नहीं, बल्कि उन हजारों मजदूरों के लिए उम्मीद की किरण है, जो रोजाना पत्थरों और धूल के बीच काम करते हुए अपनी सांसें दांव पर लगा देते हैं।

    स्टोन क्रशर की धूल ने बिगाड़ी हालत एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अल्केश खुराना और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिनव खुराना ने बताया कि मरीज लंबे समय से स्टोन क्रशर में काम कर रहा था। वहां उड़ने वाली बारीक सिलिका धूल सांस के साथ उसके फेफड़ों में पहुंचती रही और धीरे-धीरे वहां जमती चली गई।

    इस स्थिति को मेडिकल भाषा में डिफ्यूज एल्वियोलर प्रोटीनोसिस कहा जाता है। इसमें फेफड़ों की हवा वाली थैलियों में प्रोटीन भर जाता है, जिससे ऑक्सीजन का आदान-प्रदान रुकने लगता है। यही कारण था कि मरीज को सांस लेने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी और उसका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिरता जा रहा था।

    6 घंटे चली बेहद जोखिमभरी प्रक्रिया डॉ. खुराना के अनुसार, होल लंग्स लैवेज एक बेहद जटिल और जोखिमभरी प्रक्रिया है। इसमें फेफड़ों के अंदर 6 से 8 लीटर तक सलाइन वाटर डाला जाता है और फिर उसे बाहर निकाला जाता है, ताकि जमा प्रोटीन साफ हो सके।

    यह प्रक्रिया इसलिए भी खतरनाक होती है क्योंकि ज्यादा मात्रा में पानी फेफड़ों में जाने से मरीज की जान को सीधा खतरा हो सकता है। इसी वजह से पूरी प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी के साथ करीब 6 घंटे में पूरा किया गया। डॉक्टरों की एक पूरी टीम लगातार मरीज के ऑक्सीजन स्तर, हृदय गति और ब्लड प्रेशर पर नजर रखे हुए थी।

    कार्डियक ओटी में हुआ ऑपरेशन इस जटिल प्रक्रिया को कार्डियक ओटी में किया गया, जिसमें कार्डियक थोरेसिक सर्जन डॉ. योगेश निवारिया भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि इस इलाज की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जब एक फेफड़े को साफ किया जा रहा होता है, तब मरीज को दूसरे फेफड़े के सहारे ही सांस लेनी पड़ती है।

    इस मरीज के मामले में मुश्किल और बढ़ गई थी, क्योंकि दूसरा फेफड़ा भी काफी कमजोर हो चुका था। ऐसे हालात में कई बार मरीज को हार्ट-लंग मशीन यानी आर्टिफिशियल लंग्स पर रखना पड़ता है। हालांकि, डॉक्टरों की सतर्कता और सही रणनीति के चलते इस मरीज को मशीन पर डालने की जरूरत नहीं पड़ी और प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो गई।

    क्या है सिलिकोसिस और क्यों है यह जानलेवा सिलिकोसिस सिलिका नामक बेहद बारीक धूल के कणों से होने वाली बीमारी है। ये कण सांस के साथ फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और वहां जमा होकर फेफड़ों की कोमल झिल्लियों को नुकसान पहुंचाते हैं। धीरे-धीरे फेफड़े स्पंज जैसे नरम रहने के बजाय पत्थर की तरह सख्त हो जाते हैं।

    जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज को सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, थकान और ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। अंतिम चरण में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और मरीज की मौत तक हो सकती है।

    मजदूर सबसे ज्यादा चपेट में सिलिकोसिस का सबसे बड़ा शिकार वे मजदूर होते हैं, जो खदानों, स्टोन क्रशर, पत्थर की पाउडर मिलों, सीमेंट फैक्ट्रियों और कांच-सिरेमिक उद्योगों में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर मजदूर गरीब तबके से आते हैं और सुरक्षा उपकरणों की कमी या जानकारी के अभाव में इस जानलेवा धूल के संपर्क में रहते हैं।

    डॉक्टरों का कहना है कि सिलिकोसिस से बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है। इसके लिए कार्यस्थलों पर धूल नियंत्रण, मास्क और नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी है।