Category: विदेश

  • यूक्रेन पर रूस का विशाल हमला: एक रात में 600 से ज्यादा ड्रोन और मिसाइल, सभी मोर्चों से अटैक

    यूक्रेन पर रूस का विशाल हमला: एक रात में 600 से ज्यादा ड्रोन और मिसाइल, सभी मोर्चों से अटैक

    कीव 

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है. यूक्रेन की वायुसेना के मुताबिक, रूस ने 24-25 अप्रैल की रात देश के अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए बड़ा हवाई हमला किया. इस हमले में रूस ने 47 मिसाइलों और 619 ड्रोन का इस्तेमाल किया। 

    यूक्रेनी वायुसेना के मुताबिक, रात 6 बजे से शुरू हुए इस हमले में कुल 666 हवाई हमले किए गए. इनमें 12 बैलिस्टिक मिसाइलें (Iskander-M और S-400), 29 Kh-101 क्रूज मिसाइलें, 5 कैलिबर मिसाइलें और 619 अलग-अलग तरह के ड्रोन शामिल थे. इन ड्रोन में बड़ी संख्या ईरान के 'शाहेद' जैसे कामिकाजे ड्रोन की थी, जो खास तौर पर टारगेट पर सीधे टकराकर विस्फोट करते हैं। 

    यूक्रेन ने दावा किया है कि उसकी एयर डिफेंस सिस्टम ने इस बड़े हमले का काफी हद तक मुकाबला किया. वायुसेना के मुताबिक, कुल 610 टारगेट्स को या तो मार गिराया गया. इसमें 30 मिसाइलें और 580 ड्रोन शामिल हैं. खास बात यह है कि 26 Kh-101 और 4 कैलिबर मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया गया, जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान को टाला जा सका। 

    13 मिसाइलों ने यूक्रेन को किया हिट
    यूक्रेन पूरी तरह से इस हमले को रोकने में सफल नहीं रहा. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, 13 मिसाइलें और 36 ड्रोन अपने टारगेट तक पहुंचने में कामयाब रहे, जिससे देश के 23 अलग-अलग स्थानों पर हमले हुए. इसके अलावा, गिराए गए ड्रोन के मलबे भी 9 जगहों पर गिरे, जिससे स्थानीय स्तर पर नुकसान हुआ. अभी भी चार मिसाइलों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। 

    जमीन, समुद्र और हवा तीनों से ईरान पर हमले!
    रूस ने यह हमला जमीन, समुद्र और हवा, तीनों माध्यमों से किया. मिसाइलें रूस के अलग-अलग इलाकों जैसे मिलेरोवो, कुर्स्क और ब्रायंस्क से दागी गईं, जबकि कुछ लॉन्चिंग कैस्पियन सागर और क्रीमिया क्षेत्र से भी हुई. यह साफ संकेत है कि रूस अब यूक्रेन के खिलाफ मल्टी-डायमेंशनल अटैक स्ट्रैटेजी अपना रहा है। 

  • हिंद महासागर में अमेरिका ने ईरानी टैंकर को घेरा, 3 जहाजों की घेराबंदी से बढ़ा संकट

    हिंद महासागर में अमेरिका ने ईरानी टैंकर को घेरा, 3 जहाजों की घेराबंदी से बढ़ा संकट

    तेहरान 

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब समुद्र के बीच खुली ताकत की लड़ाई में बदलता जा रहा है. ईरान के जहाज चकमा देकर होर्मुज को पार कर रहे हैं. लेकिन अब ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी सेना ने एशियाई समुद्री इलाकों में ईरान के कम से कम तीन तेल टैंकरों को रोक लिया है और उन्हें उनके रास्ते से हटा दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ये जहाज भारत, मलेशिया और श्रीलंका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में मौजूद थे. अमेरिकी सेना ने इन्हें इंटरसेप्ट कर उनकी दिशा बदल दी, जिससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका अब ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है। 

    इन टैंकरों में ‘डीप सी’, ‘सेविन’ और ‘डोरेना’ शामिल हैं. ‘डीप सी’ एक बड़ा सुपरटैंकर है, जो आंशिक रूप से कच्चे तेल से भरा हुआ था और आखिरी बार मलेशिया के तट के पास देखा गया था. वहीं ‘सेविन’ नाम का छोटा टैंकर अपनी क्षमता का करीब 65 प्रतिशत तेल लेकर चल रहा था 

    भारत के करीब ईरानी जहाज पर अमेरिका का एक्शन
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अहम जहाज ‘डोरेना’ बताया जा रहा है, जो करीब 20 लाख बैरल कच्चे तेल से पूरी तरह भरा हुआ था. यह जहाज चार दिन पहले भारत के दक्षिणी तट के पास देखा गया था, जिसके बाद अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत ने उसे हिंद महासागर में एस्कॉर्ट करते हुए अपनी निगरानी में ले लिया. इसके अलावा ‘डेर्या’ नाम के एक और ईरानी टैंकर को भी रोके जाने की खबर है. यह जहाज भारत में अपना तेल उतार नहीं सका था, क्योंकि ईरानी तेल खरीदने की अमेरिकी छूट खत्म हो चुकी थी। 

    होर्मुज में अमेरिका ने बनाई दीवार!
    अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी को और कड़ा कर दिया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अब तक 29 जहाजों को वापस लौटने या दिशा बदलने के लिए मजबूर किया जा चुका है. यह पूरी कार्रवाई ऐसे समय हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य पहले ही तनाव का केंद्र बना हुआ है. ईरान ने भारत आ रहे एक जहाज को कब्जे में ले लिया. वहीं ईरान के तेल टैंकर अमेरिका को चकमा देकर होर्मुज से निकल रहे हैं। 

  • ईरान में मोजतबा खामेनेई का खेल हुआ खत्म, IRGC ने किया कांड, क्या यह ट्रंप के सपने का सच होना है?

    ईरान में मोजतबा खामेनेई का खेल हुआ खत्म, IRGC ने किया कांड, क्या यह ट्रंप के सपने का सच होना है?

    तेहरान 

    ईरान में जिसका डर था, लगता है वह खेल हो गया. अमेरिका ने ईरान पर अटैक कर सियासी तौर पर दो फाड़ करवा दिया है. अमेरिका ईरान में रिजीम चेंज करना चाहता था. ईरानी सरकार और सेना में तकरार से ऐसा लग रहा कि डोनाल्ड ट्रंप का मकसद पूरा होने वाला है. जी हां, ईरान में खामेनेई की सत्ता पर अब किसी और का कंट्रोल हो गया है. खुद ईरान की सेना यानी आईरजीसी ने ही ईरान की सत्ता पर कंट्रोल कर लिया है. ईरान में अब मोजतबा खामेनेई की नहीं चल पा रही है. उन्हें साइडलाइन कर दिया गया है. पेजेशकियान भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. आईआरजीसी ने खामेनेई को सरकार से अलग-थलग कर दिया है और सरकारी कामकाज पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है. कई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. ईरान में यह सबकुछ तब हो रहा, जब अमेरिका बातचीत का दूसरा दौर शुरू करने को बेताब है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज यानी बुधवार को अमेरिका-ईरान की वार्ता होने वाली है। 

    दरअसल, जब से अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया है, तब से तेहरान में सियासी अनिश्चितता छाई हुई है. ईरान पर अभी किसका कंट्रोल है, किसी को कुछ नहीं समझ आ रहा. आपसी सियासी तकरार अब उभरने लगी हैं. 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के हमलों में पुराने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया. लेकिन उनकी हालत और जगह के बारे में साफ जानकारी नहीं मिल रही है. वे पिछले कई हफ्तों से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे गंभीर रूप से घायल या असमर्थ हो सकते हैं। 

    ईरान की सत्ता पर किसका कंट्रोल?

    टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट्स के हवाले से दावा किया कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कथित तौर पर देश के प्रमुख कामकाज पर नियंत्रण कर लिया है. ऐसा करके ईरानी सेना ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को किनारे कर दिया है. उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में धकेल दिया है, क्योंकि सेना देश के सत्ता के मुख्य केंद्रों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. इतना ही नहीं, मोजतबा खामेनेई के दखल को भी रोक दिया है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, आईआरजीसी (IRGC) ने राष्ट्रपति की नियुक्तियों और फैसले को रोक दिया है. साथ ही सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना दिया है, जिससे खामेनेई सरकार प्रभावी रूप से कार्यकारी नियंत्रण से बाहर हो गई है। 

    IRGC ने खुफिया मंत्री की नियुक्ति रोक दी
    फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान पिछले गुरुवार को एक नए खुफिया मंत्री को नियुक्त करना चाहते थे. मगर आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने इसमें हस्तक्षेप किया और उनके प्रयास को विफल कर दिया. हुसैन देहगान सहित सभी प्रस्तावित उम्मीदवारों को खारिज कर दिया गया। 

    फॉक्स न्यूज के अनुसार, आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने जोर देकर कहा कि युद्ध जैसी स्थितियों को देखते हुए सभी महत्वपूर्ण और संवेदनशील नेतृत्व पदों का चयन और उन पर निगरानी सीधे आईआरजीसी द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि कोई और आदेश न आ जाए. ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति आमतौर पर खुफिया मंत्रियों को तभी नामित करते हैं जब उन्हें सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिल जाती है, क्योंकि इस पद के पास प्रमुख सुरक्षा विभागों पर अंतिम अधिकार होता है। 

    ईरानी सुप्रीम लीडर कहां हैं? 

    हाल के समय में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का कोई अता-पता नहीं है. न तो उनके लोकेशन की जानकारी है और न ही उनके स्वास्थ्य की. कई बार मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वह तेहरान में ही हैं और घायल हैं. मोजतबा खामेनेई के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने के कारण ईरानी सेना प्रभावी रूप से राष्ट्रपति को उनके पसंदीदा उम्मीदवार को आगे बढ़ाने से रोक रहा है, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गई है। 

    गौरतलब है की अमेरिकी अटैक के बाद से मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने नहीं आए हैं. वह जिंदा हैं या नहीं हैं, कहां हैं और कहां नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे शायद काम करने में असमर्थ हो गए हैं. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरानी सेना आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडरों के नेतृत्व वाली एक ‘सैन्य परिषद’ ने उन तक पहुंच को सीमित कर दिया है, जिससे वे प्रभावी रूप से सरकारी अधिकारियों से अलग-थलग पड़ गए हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी सीमित हो गया है। 

    खामेनेई की मृत्यु के बाद सत्ता का खालीपन

    फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इससे ईरानी व्यवस्था के शीर्ष पर नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हो गया है. हालांकि यह माना जा रहा है कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने एक प्रमुख भूमिका संभाल ली है, लेकिन उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से बहुत कम उपस्थिति या कोई आधिकारिक संचार देखने को मिला है. विश्वसनीय सूत्रों ने ईरान इंटरनेशनल को बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने हाल के दिनों में मोजतबा खामेनेई के साथ एक आपात बैठक करने की बार-बार कोशिश की है, लेकिन उनके सभी अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला है और उनसे कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है। 

    मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक घेरा

    फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि आईआरजीसी के सीनियर अधिकारियों से बनी एक सैन्य परिषद अब मुख्य निर्णय लेने वाली संरचना पर पूर्ण नियंत्रण रखती है. यह परिषद मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाए हुए है और देश की स्थिति पर सरकारी रिपोर्टों को उन तक पहुंचने से रोक रही है. इसी बीच बताया जा रहा है कि मोजतबा खामेनेई के करीबी लोगों के घेरे में एक अभूतपूर्व आंतरिक संकट उभर रहा है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ करीबी सहयोगी अली असगर हेजाजी को हटाने के लिए जोर डाल रहे हैं. हेजाजी सुप्रीम लीडर के कार्यालय में एक शक्तिशाली सुरक्षा अधिकारी हैं। 

    क्या है वजह

    इस तनाव की जड़ हेजाजी का मोजतबा खामेनेई के संभावित उत्तराधिकार का स्पष्ट विरोध करना है. उन्होंने पहले ‘असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स’ के सदस्यों को चेतावनी दी थी कि मोजतबा में नेतृत्व के लिए आवश्यक योग्यताएं नहीं हैं. उन्होंने तर्क दिया था कि वंशानुगत उत्तराधिकार सर्वोच्च नेता अली खामेनेई द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है. बताया जाता है कि हेजाज़ी ने आगाह किया था कि मोजतबा को ऊंचे पद पर बिठाने का मतलब होगा कि देश का पूर्ण नियंत्रण प्रभावी रूप से आईरजीसी के हाथों में चला जाएगा और नागरिक संस्थाएं हमेशा के लिए हाशिए पर चली जाएंगी

    बाहरी दबाव के बीच ईरानी सेना ने नियंत्रण बढ़ाया
    फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वोच्च नेतृत्व के कथित तौर पर कमज़ोर पड़ने या पहुँच से बाहर होने के कारण आईआरजीसी ने अपनी भूमिका को केवल सैन्य अभियानों तक सीमित न रखते हुए शासन-प्रशासन पर भी नियंत्रण स्थापित करने के लिए विस्तार दिया है. इसमें राजनीतिक नियुक्तियां और खुफिया निर्णय भी शामिल हैं. ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब ईरान को बढ़ते बाहरी दबाव और आंतरिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। 

  • ईरान युद्ध के चलते बांग्लादेश में इंटरनेट ठप हो सकता है, मोबाइल नेटवर्क पर असर

    ईरान युद्ध के चलते बांग्लादेश में इंटरनेट ठप हो सकता है, मोबाइल नेटवर्क पर असर

    ढाका 

    ईरान युद्ध की वजह से कई देशों में ईंधन संकट पैदा हो गया है। दुनिया के सबसे प्रमुख जलमार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिका और ईरान के बीच अब भी संघर्ष चल रहा है और हाल फिलहाल में कोई राहत भी मिलती नहीं दिख रही है। ऐसे में कई देशों में हालात बाद से बदतर होते जा रहे हैं। भारत के पड़ोस में बांग्लादेश में तो अब इंटरनेट ठप पड़ने के हालात बन पड़े हैं। ईंधन की भारी कमी के चलते बांग्लादेश में मोबाइल नेटवर्क पर बड़े स्तर पर बंद होने के खतरा मंडरा रहा है।

    गौरतलब है कि करीब 17 करोड़ की आबादी वाले बांग्लादेश के लिए हालात इसीलिए बिगड़ गए हैं क्योंकि वह अपनी तेल और गैस जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसमें से ज्यादातर तेल मिडिल ईस्ट से ही आता है। अब होर्मुज में शिपिंग रूट बाधित होने से बांग्लादेश में हाहाकार मच गया है।
    गारमेंट उद्योग पहले ही प्रभावित

    ढाका समेत कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर 12-12 घंटे लंबी कतारें लग रही हैं। हालात को संभालने के लिए सरकार ने हाल ही में डीजल की कीमतों में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी की है। बिजली संकट के कारण गारमेंट उद्योग पहले ही प्रभावित हो चुका है, जहां उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। अब इसकी आंच इंटरनेट तक पहुंच गई है।
    डेटा सेंटर के लिए चाहिए डीजल

    रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते सोमवार को बांग्लादेश के मोबाइल टेलीकॉम ऑपरेटर्स के संगठन (AMTOB) ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने तुरंत दखल नहीं दिया, तो मौजूदा हालात में सेवाओं को जारी रखना संभव नहीं रह जाएगा। बता दें कि टेलीकॉम कंपनियां बिजली कटौती के दौरान अपने डेटा सेंटर और नेटवर्क टावर (BTS) चलाने के लिए डीजल जनरेटर पर निर्भर रहती हैं। लेकिन अब रोजाना 5 से 8 घंटे की बिजली कटौती हो रही है, जिससे स्थिति बिगड़ गई है।
    SMS-बैंकिंग सेवाएं भी ठप हो जाएंगी

    AMTOB के अनुसार, केवल डेटा सेंटर ही हर घंटे करीब 500 से 600 लीटर डीजल खपत करते हैं। संगठन के महासचिव मोहम्मद जुल्फिकार ने कहा, “डेटा सेंटर ऑपरेटर का दिमाग होता है। अगर यह बंद हो गया, तो पूरा नेटवर्क ठप हो जाएगा।” अगर नेटवर्क बंद हुआ, तो सिर्फ कॉल और इंटरनेट ही नहीं, बल्कि SMS और बैंकिंग सेवाएं भी ठप हो सकती हैं। इसका असर आम लोगों से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक पड़ेगा। बांग्लादेश में मोबाइल फाइनेंशियल सर्विसेज (MFS) रोजमर्रा के लेन-देन का अहम हिस्सा हैं, और रेडीमेड गारमेंट (RMG) सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

  • नेपाल की नई सरकार ने बदला सैलरी सिस्टम, कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, पुरानी परंपरा टूटी

    नेपाल की नई सरकार ने बदला सैलरी सिस्टम, कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, पुरानी परंपरा टूटी

    काठमांडू 

    नेपाल सरकार ने एक बड़ा और अलग फैसला लिया है, जिसके तहत अब सरकारी कर्मचारियों को हर महीने की बजाय हर 15 दिन में सैलरी दी जाएगी। Nepal में यह पहली बार होगा जब सैलरी का भुगतान महीने में दो बार (फोर्टनाइटली) किया जाएगा। यह फैसला 17 अप्रैल को वित्त मंत्रालय स्तर पर लिया गया और इसे लागू करने के लिए संबंधित सरकारी विभागों को निर्देश भी जारी कर दिए गए हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह व्यवस्था पूरी तरह से कब से लागू होगी। सरकार का मानना है कि इससे अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा।

    अधिकारियों के अनुसार, अगर कर्मचारियों को बार-बार पैसे मिलेंगे तो वे नियमित रूप से खर्च करेंगे, जिससे बाजार में पैसा तेजी से घूमेगा और आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। दुनिया के ज्यादातर देशों में, खासकर दक्षिण एशिया में, सरकारी कर्मचारियों को मासिक सैलरी ही दी जाती है। India, Pakistan, Bangladesh, Bhutan, Sri Lanka और Maldives में अभी भी महीने में एक बार सैलरी देने की परंपरा है। हालांकि, इस नए फैसले को लागू करने में कुछ कानूनी अड़चनें आ सकती हैं। नेपाल के मौजूदा कानून के अनुसार सरकारी कर्मचारियों को हर महीने के अंत में सैलरी देने का प्रावधान है। इसलिए इस नई व्यवस्था को लागू करने के लिए कानून में बदलाव करना पड़ सकता है। 

    फाइनेंशियल कंट्रोलर जनरल ऑफिस के अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी रूप से सैलरी हर 15 दिन में देना संभव है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होगा। सरकार इस पर विचार कर रही है कि अध्यादेश (Ordinance) लाकर इसे जल्दी लागू किया जाए। कुल मिलाकर, नेपाल का यह फैसला आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।

  • 7.3 तीव्रता का भूकंप आया जापान में, सुनामी का अलर्ट जारी, लोग दहशत में

    7.3 तीव्रता का भूकंप आया जापान में, सुनामी का अलर्ट जारी, लोग दहशत में

    टोक्यो 

     सोमवार को जापान के पूर्वोत्तर तट पर प्रशांत महासागर में 7.4 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है। भूकंप का केंद्र उत्तरी इवाते प्रांत के पास समुद्र में था। भूकंप स्थानीय समयानुसार दोपहर 4:53 बजे आया। इसकी गहराई मात्र 10 किलोमीटर थी, जिससे झटके काफी तेज महसूस किए गए।

    टोक्यो तक महसूस हुए झटके
    भूकंप इतना शक्तिशाली था कि केंद्र से सैकड़ों किलोमीटर दूर टोक्यो में भी ऊंची इमारतें हिल गईं। कई इलाकों में लोगों ने तेज झटके महसूस किए। हालांकि, अभी तक किसी बड़े नुकसान या हताहत की खबर नहीं आई है, लेकिन स्थिति की निगरानी की जा रही है। 

    इसके अलावा, क्योडो के अनुसार, जापान में आए जोरदार भूकंप के बाद टोक्यो-आओमोरी बुलेट ट्रेन लाइन पर परिचालन रोक दिया गया।

    सुनामी की चेतावनी जारी
    भूकंप के बाद जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने सुनामी अलर्ट जारी कर दिया है। इवाते प्रांत और होक्काइडो के कुछ हिस्सों में 3 मीटर (10 फीट) तक ऊंची सुनामी लहरों की चेतावनी दी गई है।

    एजेंसी ने तटीय इलाकों के निवासियों को तुरंत ऊंचे स्थानों पर जाने की सलाह दी है। सुनामी लहरों के आने की उम्मीद जताई जा रही है, इसलिए सतर्कता बरतने का आग्रह किया गया है। जापान के मीडिया NHK के हवाले से रॉयटर्स ने बताया कि जोरदार भूकंपीय गतिविधि के कारण समुद्र तट के पास सुनामी भी आ गई।

    मौसम एजेंसी ने चेतावनी दी कि सुनामी की लहरें उत्तरी तटरेखा तक लगभग तुरंत पहुंच सकती हैं। एजेंसी ने कहा कि तटीय क्षेत्रों और नदी के किनारे वाले इलाकों से तुरंत किसी सुरक्षित जगह, जैसे कि ऊंची जमीन या किसी सुरक्षित इमारत में चले जाएं, और साथ ही यह भी चेताया कि सुनामी की लहरों से नुकसान होने की संभावना है।

    एजेंसी ने आगे कहा, "सुनामी की लहरें बार-बार आने की उम्मीद है। जब तक चेतावनी वापस नहीं ले ली जाती, तब तक सुरक्षित जगह न छोड़ें।"

    सालो पहले जापान में आया था प्रलय
    जापान में अक्सर भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं जो कई बार भयानक तबाही भी मचाते हैं। इसी वजह से यहां सरकार ने सख्त निर्माण नियम लागू किए हैं जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इमारतें मजबूत झटकों का सामना कर सकें। जापान के जहन में अभी भी 2011 की फुकुशिमा त्रासदी की काली यादें कैद हैं। सालो पहले जापान में 9.0-9.1 तीव्रता का भयानक भूकंप आया था जिसने एक घातक सुनामी को जन्म दिया जिसने फुकुशिमा परमाणु संयंत्र को बर्बाद कर दिया था। सुनामी से 18,500 लोग मारे गए थे या लापता हो गए थे। 

     

  • पाकिस्तान के हिंगलाज मंदिर में उत्सव, 3 लाख हिंदू शामिल; जानिए शक्तिपीठ का इतिहास

    पाकिस्तान के हिंगलाज मंदिर में उत्सव, 3 लाख हिंदू शामिल; जानिए शक्तिपीठ का इतिहास

     बलूचिस्तान प्रांत 
    पाकिस्तान में तीन दिवसीय हिंगलाज माता उत्सव रविवार को संपन्न हो गया है। खबर है कि इस दौरान करीब 3 लाख हिंदू मंदिर पहुंचे थे। कहा जा रहा है कि यह आंकड़ा बीते साल हुए उत्सव से करीब तीन गुना ज्यादा था। इस दौरान आयोजन स्थल पर भंडारा, चिकित्सा सुविधा की भी व्यवस्था की गई थी। उत्सव के दौरान तीर्थयात्री सैकड़ों किमी की यात्रा कर मंदिर पहुंचते हैं।

    पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, मंदिर में इस महीने करीब 3 लाख हिंदू श्रद्धालु पहुंचे थे। जबकि, पूरे साल में यह आंकड़ा करीब 10 लाख है। मंदिर पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं ने थारपरकर, उमरकोट और संहार समेत सिंध के कई इलाकों से लंबी यात्रा की थी। कहा जाता है कि इस यात्रा को पूरी करने में 20 दिनों का समय लग जाता है।

    हिंगलाज मंदिर का इतिहास
    पाकिस्तान में इस तीर्थस्थल को नानी का मंदिर भी कहा जाता है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यहां सती का सिर गिरा था। लयारी तहसील के पहाड़ी इलाके में स्थित यह मंदिर हिंगोल नदीं के पास एक गुफा में बना हुआ है। कराची से इसकी दूरी लगभग 250 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में है। यह इलाका हिंगोल नेशनल पार्क क्षेत्र में आता है।

    पूरे पाकिस्तान से आते हैं श्रद्धालु
    इस तीर्थ यात्रा को हिंगलाज यात्रा कहा जाता है, जिसमें पाकिस्तान के कई हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कठिन यात्रा कर पहुंचते हैं। अप्रैल 2024 में एपी न्यूज से बातचीत में हिंगलाज माता मंदिर के पदाधिकारी वर्सीमल दीवानी ने बताया था कि इस त्योहार में सिर्फ पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू ही शामिल हो सकते हैं। तब उन्होंने पाकिस्तानी सरकार से दुनिया के अन्य हिस्सों में हिंदुओं को वीजा देने की अपील भी की थी। हालांकि, कहा यह भी जा रहा है कि इस यात्रा में अन्य देशों से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं।
    ऐसे होती है पूजा

    हर साल अप्रैल में इस उत्सव का आयोजन होता है, जिसके तहत तीसरे दिन पुजारी मंत्रों का जाप करते हैं और देवताओं को भेंट स्वीकार करने के लिए बुलाते हैं। हर श्रद्धालु हिंगलाज माता मंदिर में 3 नारियल चढ़ाता है। एक ओर जहां कुछ श्रद्धालु पूरे 4 दिनों के उत्सव में शामिल रहते हैं। वहीं, कुछ पूजा कर लौट जाते हैं।
    कठिन है यात्रा

    सड़क मार्ग से कराची से हिंगलाज की दूरी तय करने में करीब 4 घंटे का समय लगता है। कुछ तीर्थयात्री कार या बसों से पहुंचते हैं। जबकि, कुछ साइकिल से आते हैं। कहा जाता है कि पहले इस यात्रा को पूरा करने में करीब 150 किमी पैदल चलना होता था। तब श्रद्धालु रेगिस्तान से पास की सड़क तक का सफर तय कर मंदिर पहुंचते थे। हालांकि, अब मकरान कोस्टल हाईवे ने रास्ता आसान कर दिया है।
    इस साल का आयोजन

    डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, मंदिर उत्सव के लिए बलूचिस्तान सरकार, प्रांत के आपदा प्रबंधक और जिला प्रशासन ने कई स्तरों पर तैयारियां की थीं। वहीं, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सुरक्षा व्यवस्था के चलते मौके पर मौजूद रहे। सुरक्षा के लिए पाकिस्तान सेना, फ्रंटियर कोर, पुलिस और लेवी की टुकड़ियों को तैनात किया गया था।

  • कमला हैरिस ने कहा- नेटन्याहू ने ट्रंप को ईरान युद्ध में खींचा, ‘एपस्टीन फाइल्स’ से ध्यान भटकाने का प्रयास किया

    कमला हैरिस ने कहा- नेटन्याहू ने ट्रंप को ईरान युद्ध में खींचा, ‘एपस्टीन फाइल्स’ से ध्यान भटकाने का प्रयास किया

    वॉशिंगटन
     अमेरिका की पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि उन्हें इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के साथ सैन्य संघर्ष में 'खींच लिया' और इसे 'एपस्टीन फाइल्स' से ध्यान भटकाने की एक 'कमजोर कोशिश' बताया। 

    मिशिगन डेमोक्रेटिक वीमेन कॉकस द्वारा शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम में कमला हैरिस ने इन शत्रुताओं को एक ऐसे युद्ध के रूप में बताया जिसे 'अमेरिकी लोग नहीं चाहते.' डेट्रॉइट में अपने संबोधन के दौरान, हैरिस ने प्रशासन के इरादों की और भी कड़ी आलोचना की और ट्रंप पर 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' का इस्तेमाल घरेलू विवादों से ध्यान भटकाने के लिए करने का आरोप लगाया. उन्होंने मौजूदा नेतृत्व को अमेरिका के इतिहास का 'सबसे भ्रष्ट, संवेदनहीन और अक्षम' प्रशासन करार दिया। 

    प्रेसिडेंट के लीडरशिप स्टाइल के बारे में बताते हुए हैरिस ने कहा कि ट्रंप 'ऐसे घूमना चाहते हैं जैसे वह मजबूत हों और जिसे चाहें उसके खिलाफ अमेरिका की मिलिट्री की ताकत का इस्तेमाल करेंगे.' उन्होंने कहा कि यह तरीका विदेश नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव दिखाता है और दावा किया कि वह 'दूसरे विश्व युद्ध के बाद से किसी भी पार्टी के अमेरिका के पहले प्रेसिडेंट हैं जिन्होंने अमेरिका की जिम्मेदारी छोड़ दी है. हमारे गठबंधनों, हमारी दोस्ती को बढ़ावा देने और बचाने की। 

    पूर्व उप-राष्ट्रपति ने कहा कि वैश्विक मानकों की अनदेखी करने वाले प्रशासन ने देश की छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है. उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रंप ऐसे पहले नेता हैं जिन्होंने 'अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानदंडों, जैसे कि संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के महत्व का दिखावा भी नहीं किया और असल में उसे नजरअंदाज कर दिया। 

    हैरिस के अनुसार इन कदमों ने अमेरिका को उसके सहयोगियों की नजर में 'अविश्वसनीय' बना दिया है और कुछ खास मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए हमारे पास जो भी प्रभाव था, उसे छीन लिया है.' विदेश नीति और सैन्य भागीदारी से हटकर उन्होंने अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और प्रजनन अधिकारों जैसे घरेलू मुद्दों पर भी बात की। 

    चुनावी राजनीति की ओर बढ़ते हुए हैरिस ने डेमोक्रेटिक पार्टी की संभावनाओं पर भरोसा जताया और कहा कि उन्हें विश्वास है कि पार्टी नवंबर में होने वाले आगामी मध्यावधि चुनावों में जीत हासिल करेगी। 

  • ईरान ने ट्रंप को दी सख्त चेतावनी, कहा: ‘जरा सी गलती पर मिलेगा ताकतवर जवाब’

    ईरान ने ट्रंप को दी सख्त चेतावनी, कहा: ‘जरा सी गलती पर मिलेगा ताकतवर जवाब’

    तेहरान 

    ईरान और अमेरिका में जारी तनाव के बीच तेहरान ने एक बार फिर सख्त लहजे में चेतावनी दी है. ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मह बाकर ग़ालिबाफ ने साफ कहा है कि ईरान बातचीत के लिए तैयार जरूर है, लेकिन अगर जरा सी भी गलती हुई तो जवाब पूरी ताकत से दिया जाएगा। 

    टीवी पर रविवार को दिए गए संबोधन में गालिबाफ ने दो टूक कहा कि ईरान इस समय हाई अलर्ट पर है. उन्होंने कहा, "हम पूरी तरह तैयार हैं. अगर उन्होंने जरा सी भी गलती की, तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे." उनके इस बयान से साफ है कि एक तरफ वार्ता की बात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ सख्ती भी बरकरार है। 

    गालिबाफ ने यह भी दावा किया कि ईरान ने मैदान में अपनी ताकत दिखाई है और अब वह मजबूत स्थिति से बातचीत करना चाहता है. उन्होंने कहा कि इस बार ईरान की सैन्य क्षमता पहले के मुकाबले काफी बेहतर है और यह बात जंग के दौरान साफ नजर आई है। 

    हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अमेरिका के पास संसाधन और ताकत ज्यादा है. गालिबाफ ने कहा, "हम सैन्य तौर पर अमेरिका से मजबूत नहीं हैं. उनके पास ज्यादा पैसा, ज्यादा हथियार और ज्यादा अनुभव है." लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अपनी रणनीति और तैयारी के दम पर हालात को अपने पक्ष में मोड़ा है। 

    गालिबाफ के मुताबिक, यह सीधी लड़ाई नहीं बल्कि अलग तरह की जंग है, जिसमें ईरान ने अपनी योजना के जरिए मजबूत देशों का मुकाबला किया. उन्होंने कहा कि विरोधी देशों के पास संसाधन तो थे, लेकिन उनकी रणनीति सही नहीं रही, जबकि ईरान ने बेहतर तरीके से काम किया। 

    गालिबाफ ने अमेरिका के फैसलों पर भी सवाल उठाए और कहा कि उनके विरोधी ईरान को सही तरीके से समझ नहीं पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि "वे हमारे लोगों को लेकर भी गलत सोच रखते हैं और सैन्य फैसलों में भी गलती करते हैं। 

    इस दौरान उन्होंने इजरायल पर भी निशाना साधा. गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका भले ही "अमेरिका फर्स्ट" की बात करता हो, लेकिन असल में उसके फैसलों में इजरायल की भूमिका ज्यादा नजर आती है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका कई बार इजरायल से मिली जानकारी के आधार पर फैसले लेता है, जो सही नहीं होती। 

    इसके अलावा, गालिबाफ ने यह भी कहा कि विरोधी देशों ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली. उनके मुताबिक, ईरान को अस्थिर करने और उसकी तेल संपत्ति पर कब्जा करने की योजना भी नाकाम रही। 

    इस बीच, अमेरिका की तरफ से भी रुख सख्त बना हुआ है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि ईरान पर दबाव बनाकर रखा जाएगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ब्लॉकेड जारी रहेगी और ईरानी जहाजों को उसके पोर्ट से निकलने नहीं दिया जाएगा. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों देश बातचीत की राह चुनते हैं या फिर टकराव और बढ़ता है। 

  • ‘डील नहीं तो बमबारी’, ट्रंप ने ईरान को दिया आखिरी अल्टीमेटम

    ‘डील नहीं तो बमबारी’, ट्रंप ने ईरान को दिया आखिरी अल्टीमेटम

    वाशिंगटन

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने दोहरे तेवर में नजर आए हैं. एक तरफ वे ईरान के साथ युद्ध खत्म होने पर व्हाइट हाउस में "पार्टी" करने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ खुली चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तय समय तक समझौता नहीं हुआ, तो फिर से बमबारी शुरू हो सकती है। 

    एयर फोर्स वन पर पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने साफ कहा कि वह ईरान के साथ चल रहे सीजफायर को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं भी हो सकते. उन्होंने कहा, "शायद मैं इसे एक्सटेंड न करूं. अगर ऐसा हुआ तो ब्लॉकेड जारी रहेगा और हमें फिर से बम गिराने पड़ सकते हैं। 

    राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि 21 अप्रैल की डेडलाइन बेहद अहम है. अगर इस तारीख तक अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता, तो सीजफायर खत्म हो सकता है. इसका मतलब साफ है कि मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की तरफ बढ़ सकता है. हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि डील हो जाएगी. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यह होने वाला है" लेकिन ईरान का कहना है कि उनकी बातों पर भरोसे कम है। 

    होर्मुज के आसपास ब्लॉकेड रहेगा जारी
    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया कि चाहे सीजफायर बढ़े या नहीं, अमेरिका का ईरान पर लगाया गया नौसैनिक ब्लॉकेड जारी रहेगा. यह ब्लॉकेड ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने की बड़ी रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि इससे उसके तेल निर्यात पर सीधा असर पड़ता है. यानी भले ही बातचीत जारी हो, लेकिन दबाव की राजनीति भी साथ-साथ चलती रहेगी। 

    अमेरिका-ईरान में बातचीत की कोशिशें जारी
    इस बीच खबर है कि अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि जल्द ही पाकिस्तान में एक नई बातचीत के दौर के लिए मिल सकते हैं. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि दोनों पक्ष किसी समझौते तक पहुंचने की कोशिश में हैं. ईरानी सूत्रों की तरफ से खबरें चल रही हैं कि सोमवार को ये बातचीत इस्लामाबाद में होगी और रविवार शाम तक दोनों देशों के नेता पाकिस्तान पहुंचेंगे. पिछले दौर की बातचीत बिना नतीजे के खत्म हुई थी, ऐसे में इस बार का राउंड और भी अहम माना जा रहा है। 

    ट्रंप का "डबल गेम"
    ट्रंप की रणनीति को समझना मुश्किल नहीं है. एक तरफ वह बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सैन्य दबाव बनाए रखते हैं.  फिलहाल हालात बेहद नाजुक हैं. 21 अप्रैल की डेडलाइन करीब है और पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता हो पाता है या नहीं।