Category: बिज़नेस

  • खाड़ी युद्ध से महंगाई का खतरा, SBI रिपोर्ट में दावा— भारत की अर्थव्यवस्था पर असर रहेगा सीमित

    खाड़ी युद्ध से महंगाई का खतरा, SBI रिपोर्ट में दावा— भारत की अर्थव्यवस्था पर असर रहेगा सीमित

    नई दिल्ली. खाड़ी क्षेत्र में चल रहा संघर्ष, जिसमें इजरायल, ईरान और अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकाने शामिल हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकता है। शनिवार को जारी एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो इससे वैश्विक मंदी का दबाव, महंगाई में वृद्धि और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के घरेलू वित्तीय बाजारों को फिलहाल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कदमों से सपोर्ट मिला है। आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड (जी-सेक) यील्ड को संतुलित रखने और रुपए की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो इससे भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक संकेतकों पर भी दबाव पड़ सकता है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करके रुपए की अधिक अस्थिरता को कम किया है और इसे 92 के स्तर से नीचे रखने में सफलता हासिल की है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा अनिश्चितता के बीच यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ा है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है, इसलिए यहां बाधा आने से तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमत 91.84 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई 89.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है।

    एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी होती है, तो वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा (सीएडी) करीब 36 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6 प्रतिशत तक आ सकती है। एसबीआई रिसर्च ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इस संघर्ष का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह युद्ध कोंड्राटिएफ वेव के अंतिम चरण के दौरान हो रहा है, जो लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक चक्र का सिद्धांत है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संरचनात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, इस संघर्ष में कुछ देशों को फायदा भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका को तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से लाभ मिल सकता है। साथ ही, यूरोप की रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम होने से अमेरिका के लिए नए अवसर बन सकते हैं। वहीं, दुनिया के अधिकांश अन्य क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच कई केंद्रीय बैंक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में फिलहाल लगभग 17.6 प्रतिशत हिस्सा सोने का है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष का असर भारत पर कई तरीकों से पड़ सकता है। इसमें खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस, कच्चे तेल का आयात और पश्चिम एशियाई देशों के साथ व्यापार शामिल हैं। हालांकि रूसी कच्चे तेल की खरीद और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स जैसे कदमों के कारण आपूर्ति से जुड़े जोखिम कुछ हद तक कम हो सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय बैंक और निजी कंपनियां भी उन क्षेत्रों से जुड़ी हैं जो इस संघर्ष से प्रभावित हो सकते हैं।

    रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता तेल की कीमतों, महंगाई की उम्मीदों और निवेशकों के भरोसे को आने वाले समय में प्रभावित करती रहेगी। इसलिए नीति निर्माताओं और निवेशकों को इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखने की जरूरत है।

  • केला, अंगूर, अनार और सब्जियां… दुबई में 1000 कंटेनर सड़ रहे, भारत को हुआ बड़ा नुकसान

    केला, अंगूर, अनार और सब्जियां… दुबई में 1000 कंटेनर सड़ रहे, भारत को हुआ बड़ा नुकसान

     नई दिल्‍ली

    मिडिल ईस्‍ट में संघर्ष के कारण महाराष्‍ट्र के किसानों और निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. एग्री प्रोडक्‍ट्स से जुड़े 800 से 1000 कंटेनर दुबई के जेबल अली बंदरगाह पर फंसे हुए हैं. 28 फरवरी से ही इनका कामकाज ठप है. कंटेनर अलग-अलग देशों या क्षेत्रों में एक्‍सपोर्ट नहीं हो पा रहे हैं, जिस कारण लाखों-करोड़ों के सामान खराब हो रहे हैं।

    दुबई का जेबेल अली पोर्ट मिडिल ईस्‍ट का एक प्रमुख बंदरगाह, जो खाड़ी क्षेत्र में कृषि उत्पादों के वितरण का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. हालांकि, संघर्ष के कारण कामकाज पूरी तरह से ठप हो चुका है. इस कारण दुबई पहुंच चुके या भारत से आ रहे कई शिपमेंट बंदरगाह पर ही फंसे हुए हैं।

    निर्यातकों को भारी नुकसान
    फंसे हुए कंटेनरों में मुख्य रूप से केले, अंगूर, अनार, तरबूज, पत्तेदार सब्जियां और प्याज जैसे कम समय तक टिकने वाले कृषि उत्‍पाद हैं. यह महाराष्ट्र से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पाद भी हैं. कंटेनर फंस जाने के कारण ये खराब हो सकते हैं, जिसका मतलब है कि निर्यातकों को भारी नुकसान होगा. कंटेनर ऐसे समय में भी फंसे हैं जब खाड़ी देशों में रमजान के दौरान इन फलों, विशेष रूप से अंगूर और अनार की मांग चरम पर होती है. इसलिए कारोबार कम होने की भी आशंका है।

    घाटे में बेचना पड़ सकता है अंगूर
    वॉर के कारण कंटेनर तो फंसे ही हैं, जिससे मांग पूरी नहीं हो पा रही है. दूसरी ओर, खाड़ी देशों में फलों की मांग में परंपरागत रूप से वृद्धि देखी जाती है. वहीं किसान इस मौसमी बदलाव के अनुसार अपनी फसल की कटाई की योजना बनाते हैं. हालांकि, इस वर्ष संघर्ष के कारण निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है. बंदरगाहों पर मौजूद लगभग 5,000 से 6,000 टन अंगूर प्रभावित होने की आशंका है और खेतों में मौजूद निर्यात योग्य गुणवत्ता वाले 10,000 टन अंगूरों को अब स्थानीय स्तर पर घाटे में बेचना पड़ सकता है।

    बंदरगाह पर भीड़भाड़ के कारण और देरी 
    मुंबई के जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT) पर दुबई जाने वाले अंगूर के लगभग 80 कंटेनर अभी तक अनलोड नहीं किए गए हैं. नासिक से निर्यात के लिए आ रहे 200 से अधिक कंटेनर बंदरगाह के बाहर फंसे हुए हैं, जिससे भारी जाम लग गया है. स्थिति गंभीर है और निर्यातकों का कहना है कि जब तक जहाजरानी सर्विस फिर से शुरू नहीं हो जातीं, तब तक यह समस्या बनी रहेगी. इंडियन ग्रेप एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के निदेशक मधुकर क्षीरसागर के अनुसार, फंसे हुए हर कंटेनर से भारी नुकसान होता है, जिससे लाखों रुपये का वित्तीय नुकसान होता है।

    किसानों ने सरकार से अपील की
    किसान संगठन तत्काल सरकारी सहायता की मांग कर रहे हैं. महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संघ के अध्यक्ष भरत दिघोले ने सरकार से प्रति क्विंटल 1,500 रुपये की सब्सिडी देने के साथ-साथ फंसे हुए कंटेनरों के लिए बंदरगाह शुल्क और विलंब शुल्क माफ करने का अनुरोध किया है. इसके अलावा, निर्यातकों की सहायता के लिए एक अस्थायी खरीद योजना शुरू करने की भी मांग की गई है, ताकि माल की निकासी होने तक उन्हें सहायता मिल सके।

    निर्यातकों ने खेप वापस मंगाई
    कुछ निर्यातकों ने पहले ही अपने माल को वापस मंगाना शुरू कर दिया है. प्रमुख निर्यातक प्रकाश गायकवाड़ ने बताया कि लंबे समय तक देरी के कारण उन्हें जेएनपीटी से केले और प्याज के कंटेनर वापस मंगाने पड़े, क्योंकि देरी से फसल खराब हो रही थी. नासिक सीमा शुल्क को भेजे गए प्याज के एक शिपमेंट को मंजूरी मिलने में चार दिन लग गए, तब तक पूरा माल खराब हो चुका था।

    कृषि आयात और निर्यात पर व्यापक प्रभाव
    इस रुकावट का असर खाड़ी देशों और ईरान से आयात पर भी पड़ा है. सेब, कीवी और खजूर जैसे उत्पादों से भरे लगभग 600-700 कंटेनर ईरानी बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं. फल व्यापारी सुयोग ज़ेदे के अनुसार, इन कंटेनरों का मूल्य काफी अधिक है, जिनमें कीवी के कंटेनरों का मूल्य 30-32 लाख रुपये और खजूर के कंटेनरों का मूल्य 45 लाख रुपये है।

    इसके अलावा, भारत के चीनी निर्यात अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं. केंद्र ने इस सीजन में 20 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दी थी, लेकिन निर्यातकों का अनुमान है कि मौजूदा व्यवधानों के कारण केवल लगभग 5 लाख टन चीनी ही बाजार तक पहुंच पाएगी।

  • मुंबई में अनिल अंबानी और रिलायंस पावर के 12 ठिकानों पर ED का बड़ा एक्शन

    मुंबई में अनिल अंबानी और रिलायंस पावर के 12 ठिकानों पर ED का बड़ा एक्शन

    मुंबई

    प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शुक्रवार को उद्योगपति अनिल अंबानी और रिलायंस पावर लिमिटेड से जुड़े कई व्यवसायों और अधिकारिक ठिकानों पर छापेमारी की. समाचार एजेंसी IANS ने सूत्रों के हवाले से बताया कि मुंबई में 10 से 12 जगहों पर एक साथ ये कार्रवाई की जा रही है. ED की करीब 15 विशेष टीमों ने तड़के सुबह ही रिलायंस पावर से जुड़े लोगों के दफ्तरों और घरों पर तलाशी शुरू कर दी थी।

    सूत्रों ने संकेत दिया है कि ये तलाशी रिलायंस पावर से जुड़े संदिग्ध फंड ट्रांसफर और लेनदेन की जांच का हिस्सा हैं. हालांकि, शुक्रवार की इन छापेमारी पर ED ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

    बैंक धोखाधड़ी मामले में हो चुकी है कुर्की 
    इससे पहले, ED ने रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (RCom) के बैंक धोखाधड़ी मामले में अनिल अंबानी के पाली हिल स्थित आलीशान घर 'एबोड' (Abode) को अस्थायी रूप से कुर्क (Attach) किया था, जिसकी कीमत 3,716.83 करोड़ रुपये आंकी गई है।

    पिछले महीने के अंत में, CBI ने भी बैंक ऑफ बड़ौदा की शिकायत पर अनिल अंबानी के आवास और RCom के कार्यालयों की तलाशी ली थी।

    अनिल अंबानी की कंपनी पर क्या हैं आरोप?
    CBI की FIR के मुताबिक, रिलायंस कम्युनिकेशंस ने बैंक ऑफ बड़ौदा को 2,220 करोड़ रुपये से ज्‍यादा का नुकसान पहुंचाया है. आरोप है कि कंपनी ने कर्ज के पैसों का गलत इस्तेमाल किया और फर्जी लेनदेन के जरिए पैसे इधर-उधर किए. साथ ही, कंपनी के खातों (Books of Accounts) में हेराफेरी कर अनियमितताओं को छिपाने की कोशिश की गई. फिलहाल, ED ने इन ताजा छापों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।

    पिछले महीने हुई थी घर की जब्ती
    पिछले ही महीने फरवरी 2026 में, ईडी ने अनिल अंबानी पर बड़ी कर्रवाई की थी। जिसमें अनिल अंबानी के मुंबई स्थित घर, 'अबोड' अस्थायी रूप से जब्त कर लिया था। इस घर की अनुमानित कीमत 3,500 करोड़ रुपये बताई जाती है। यह जब्ती रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े 40,000 करोड़ रुपये के बैंक धोखाधड़ी मामले की लंबे समय से चल रही जांच के सिलसिले में की गई थी। इस जब्ती के साथ अंबानी ग्रुप की संपत्तियों की कुल जब्ती राशि 15,700 करोड़ रुपये से अधिक तक हो गई थी।

    क्या हैं आरोप
    आरोप है कि आरकॉम ने विभिन्न बैंकों जैसे एसबीआई, यस बैंक आदि से प्राप्त लोन की राशि को संबंधित संस्थाओं और विदेशी खातों में डायवर्ट किया गया। इसमें चीनी राज्य बैंकों से जुड़े 13,558 करोड़ रुपये के एक्सपोजर का भी जिक्र है। सीबीआई की 2019 की एफआईआर के आधार पर यह मनी लॉन्ड्रिंग जांच चल रही है। ईडी ने विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मामले की जांच कर रही है।

     

  • खुलते ही ढह गया बाजार, सेंसेक्स 500 अंक गिरा, निफ्टी 24,600 के करीब क्यों पहुंचा?

    खुलते ही ढह गया बाजार, सेंसेक्स 500 अंक गिरा, निफ्टी 24,600 के करीब क्यों पहुंचा?

    मुंबई

    शेयर बाजार में आज 6 मार्च को जोरदार गिरावट के साथ बाजार खुले हैं. सुबह 9:22 बजे पर सेंसेक्स 542 अंक गिरकर 79,472 के करीब ट्रेड कर रहा और निफ्टी 169 अंक फिसलकर 24,607 पर कारोबार कर रहा है. बैंक निफ्टी में 14 में से 10 शेयर्स में गिरावट देखने को मिल रही है. बाजार में आज 1021 शेयरों में बढ़त देखने को मिली, 1011 शेयरों में गिरावट रही, जबकि 195 शेयर बिना बदलाव के नजर आ रहे है. भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, इंफोसिस, एचसीएल टेक, टीसीएस और विप्रो निफ्टी टॉप गेनर्स हैं. वहीं, इंटरग्लोब एविएशन, आईसीआईसीआई बैंक, टाटा स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट और एलएंडटी निफ्टी टॉप लूजर्स में शामिल रहे हैं। 

    बाजार में वोलैटिलिटी थोड़ी बढ़ी है, इंडिया VIX करीब 3.5% बढ़कर 18.48 पर पहुंच गया, जो बाजार में अनिश्चितता को दिखाता है. यह गिरावट पिछले सेशन की तेज रैली के बाद आई है, जब सेंसेक्स करीब 900 अंक उछला था और निफ्टी 285 अंक से ज्यादा चढ़ा था. कल 5 मार्च को मेटल, इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी और ऑटो शेयरों में व्यापक खरीदारी देखने को मिली थी। 

    किन वजहों से शेयर बाजार लुढ़का?
    ग्लोबल बाजारों में रातोंरात माहौल सतर्क होता हुआ नजर आया है. अमेरिकी शेयर बाजार गुरुवार को गिरावट के साथ बंद हुए, जहां डॉव जोन्स 780 से ज्यादा अंक टूट गया. मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ीं, जिससे महंगाई और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को लेकर चिंता बढ़ गई. वहीं एशियाई बाजार भी शुक्रवार सुबह कमजोर कारोबार करते दिखे, और लंबे समय से जारी जियो-पॉलिटिकल टेंशन के बीच क्षेत्रीय बाजार छह साल की सबसे बड़ी वीकली गिरावट की ओर बढ़ते नजर आए. आज गिफ्ट निफ्टी 169.50 अंक यानी 0.68% गिरकर 24,626.50 पर कारोबार करता दिखा था, जिससे संकेत मिल रहे हैं थे कि शुक्रवार को दलाल स्ट्रीट की शुरुआत कमजोर हो सकती है। 

    एनालिस्ट की राय
    जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड विनोद नायर के अनुसार, अमेरिकी अमेरिकी ड‍िप्‍टी सेक्रेटरी के कमेंट के बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, जिसमें संकेत मिला कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील जल्द पूरी हो सकती है. हालिया करेक्शन के बाद मेटल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रियल्टी और ऑटो सेक्टर में वैल्यू बाइंग भी देखने को मिली. वहीं, गुरुवार को भारतीय रुपये की मजबूती के कारण आईटी शेयरों में गिरावट का सिलसिला जारी रहा. मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच हाल के दिनों में तेज बढ़त के बाद शुक्रवार को एशियाई कारोबार की शुरुआत में तेल की कीमतों में 2% से ज्यादा गिरावट देखने को मिली है। 

     

  • ईरान तनाव के दौरान ChatGPT से यूजर्स असंतुष्ट, अनइंस्टॉलेशन में भारी उछाल

    ईरान तनाव के दौरान ChatGPT से यूजर्स असंतुष्ट, अनइंस्टॉलेशन में भारी उछाल

    वाशिंगटन

    अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर हमला कर रहे हैं और ईरान भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है. इस दौरान अमेरिका AI कंपनियां भी चर्चा में हैं. इसमें Anthropic और OpenAI की काफी चर्चा की गई है. इस दौरान OpenAI ने जल्दबाजी में पेंटागन के साथ पार्टनरशिप कर ली लेकिन लोगों ने सोशल मीडिया पर कंपनी की काफी आलोचना की. इसके बाद ओपनएआई के चैटजीपीटी ऐप को लोगों ने अनइंस्टॉल करना शुरू किया, जिसका आंकड़ा 300 परसेंट तक पहुंच गया. इसके बाद OpenAI के सीईओ ने गलती को सुधारा।

    अमेरिकी AI कंपनी और चैटजीपीटी मेकर OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन ने माना है कि अमेरिका डिफेंस डिपार्टमेंट के साथ पार्टनरशिप करने में थोड़ा समय लेना चाहिए था. OpenAI ने पेंटागन के साथ शुरुआती डील ऐसे समय कि जब  Anthropic का कॉन्ट्रैक्सट खत्म हुआ. इसके बाद सोशल मीडिया पर ओपनएआई को विरोध का सामना करना पड़ा।

    ChatGPT ऐप किया अनइंस्टॉल 
    लोगों ने ओपनएआई का विरोध तो किया, साथ ही उसके ChatGPT ऐप को अनइंस्टॉल करना शुरू किया. सेंसर टावर के मुताबिक, 28 फरवरी को ChatGPT के अनइंस्टॉल दिन-प्रतिदिन के आधार पर 295% तक बढ़ चुके थे. वहीं दूसरी ओर Anthropic के Claude चैटबॉट के डाउनलोड्स की संख्या 51 परसेंट तक बढ़ी. साथ ही Claude अमेरिका में Apple App Store पर नंबर 1 स्थान तक पहुंच गया। 

    ऑल्टमैन ने किया X पर पोस्ट 
    सैम ऑल्टमैन ने X प्लेटफॉर्म (पुराना नाम Twitter) पर पोस्ट किया और बताया है कि ओपनएआई ने अब पेंटागन के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट को अपडेट कर दिया है. कंपनी अपने प्रिन्सिपल को क्लीयर कर दिया है। 

    उन्होंने आगे बताया है कि पेंटागन के साथ जल्दी करने का मकसद था कि अमेरिकी रक्षा विभाग और एआई इंडस्ट्री के बीच तनाव और न बढ़े. Anthropic का पेंटागन के साथ कॉन्ट्रैक्ट इसलिए खत्म हो गया था. ऑल्टमैन ने माना कि पूरी स्थिति अंत में मौकापरस्ती और अव्यवस्थित लगने लगी. ऑल्टमैन ने कहा कि वह इस अनुभव को भविष्य के फैसलों पर ध्यान रखेंगे।

    कैटी पेरी ने भी जताया विरोध 
    पॉप स्टार कैटी पेरी ने भी X प्लेटफॉर्म पर Claude के स्क्रीनशॉट के साथ दिल वाले इमोजी के साथ शेयर किया. कैटी पेरी के इस पोस्ट से पता चलता है कि वह पेंटागन की मांगों को ठुकराने वाले Anthropic के फैसले को सपोर्ट कर रही हैं। 

    ओपनएआई ने क्या बदलाव किए?
    सैम ऑल्टमैन ने एक इन्टरनल मेमो भी शेयर किया है. मेमो में बताया है कि ओपनएआई के सिस्टम का यूज अमेरिकी नागरिक पर बड़े पैमाने पर  घरेलू निगरानी में नहीं किया जा सकता है. यह प्रतिबंध अमेरिकी संविधान के National Security Act 1947 के चौथे संशोधन और FISA Act 1978 जैसे कानूनों पर बेस्ड है।
     

     

  • स्टॉक मार्केट में दमदार वापसी, युद्ध तनाव के बीच आई तेजी; ये हैं 3 अहम कारण

    स्टॉक मार्केट में दमदार वापसी, युद्ध तनाव के बीच आई तेजी; ये हैं 3 अहम कारण

    मुंबई

    तीन कारोबारी सत्र के दौरान शेयर बाजार में भारी गिरावट आई थी, लेकिन गुरुवार को शेयर बाजार में शानदार तेजी आई है. सेंसेक्‍स 440 अंक या 0.56 फीसदी चढ़कर 79555 अंक पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी 160 अंक या 0.65 फीसदी चढ़कर 24640 पर पहुंच गया. वहीं निफ्टी बैंक में भी 220 अंक चढ़कर कारोबार कर रहा था। 

    BSE टॉप 30 शेयरों की बात करें तो 16 शेयरों में उछाल है और बाकी 14 शेयरों में गिरावट देखी जा रही है. सबसे ज्‍यादा गिरावट हिंदुस्‍तान यूनिलीवर और आईटी शेयरों में आई है. वहीं रिलायंस 3 फीसदी, एनटीपीसी 2.40 फीसदी और टाटा स्‍टील के शेयर में 2 फीसदी की उछाल है. यह तेजी मिडिल ईस्‍ट में छिड़ी जंग के बीच आया है. ऐसे में कई निवेशक ये कयास लगा रहे हैं कि युद्ध खत्‍म हो सकता है. आइए जानते हैं आज शेयर बाजार में इतनी तेजी क्‍यों आई है। 

    क्‍यों आई शेयर बाजार में उछाल? 

        एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय शेयर बाजार में काफी गिरावट आ चुकी है. पिछले तीन दिनों में निवेशकों की वैल्‍यू में 22 लाख करोड़ रुपये साफ हो चुके हैं. इस कारण निचले लेवल से खरीदरी बढ़ी है. निवेशकों ने अच्‍छे और लार्जकैप शेयरों में ज्‍यादा दांव लगाया है।     एशियाई बाजार में भी तेजी रही है. जापान के शेयर बाजार में 2.50 फीसदी की तेजी आई है. अमेरिकी मार्केट में भी मिला-जुला असर दिखाई दिया है. इसके अलावा साउथ कोरिया के मार्केट में 10 फीसदी से ज्‍यादा की उछाल आई है. इधर, डॉलर की तुलना में रुपया 51 पैसा रिकवर होकर 91.54 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच चुका है। 

        इंडिया VIX डर का सूचकांक या अस्थिरता सूचकांक लगभग 10 प्रतिशत गिरकर 19.04 के स्तर पर आ गया. वहीं तकनीकी नजरिए से देखें तो जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य बाजार रणनीतिकार आनंद जेम्स का कहना है कि जंग के बीच काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले, लेकिन गैप भरने के तुरंत बाद समापन के समय हुई भारी गिरावट ने कुछ तेजी को कम कर दिया. हालांकि, 24450 के आसपास बंद होने से सकारात्मक रुझान बना हुआ है. हम 24840 का स्तर देख रहे हैं, लेकिन 24625 को एक बड़ी बाधा मानते हैं. दूसरी ओर, 24370 से नीचे फिसलने पर 24000-23550 के स्तर तक पहुंचने की संभावनाएं फिर से बन सकती हैं. अभी बाजार में गिरावट की संभावना कम है।  इन सेक्‍टर्स में मजबूती
    सिर्फ एफएमजीसी, आईटी और टेलिकॉम सेक्‍टर्स में गिरावट देखी जा रही है, बाकी के सेक्‍टर्स में शानदार तेजी है. ऑयल एंड गैस सेक्‍टर में 3.30 फीसदी की तेजी है, जबकि निफ्टी फार्मा में 1 फीसदी की तेजी है. इसके बाद ऑटो, बैंक और फाइनेंस सेक्‍टर में भी अच्‍छी तेजी है। 

  • विदेशी कंपनी की नई इलेक्ट्रिक हैचबैक, धांसू फीचर्स के साथ पंच और टियागो ईवी को मिलेगी कड़ी टक्कर

    विदेशी कंपनी की नई इलेक्ट्रिक हैचबैक, धांसू फीचर्स के साथ पंच और टियागो ईवी को मिलेगी कड़ी टक्कर

    मुंबई 

    विनफास्ट (Vinfast) इंडियन मार्केट में अपनी पकड़ को मजबूत कर रही है। कंपनी जल्द ही Limo Green इलेक्ट्रिक को मार्केट में लॉन्च करने वाली है। इसके साथ ही कंपनी इलेक्ट्रिक हैचबैक सेगमेंट में भी नया प्रोडक्ट लाने की सोच रही है। इस इलेक्ट्रिक हैचबैक का नाम VF5 है। विनफास्ट की इस इलेक्ट्रिक हैचबैक की टक्कर टाटा टियागो ईवी और पंच ईवी से होगी। कंपनी इस भारत में लॉन्च होने वाली यह ईवी कई देशों में पहले से सेल हो रही है। आइए डीटेल में जानते हैं इसके बारे में।

    VF5 की लंबाई 3967 मिमी, चौड़ाई 1723 मिमी, ऊंचाई 1579 मिमी और वीलबेस 2514 मिमी है। यह Punch.EV के मुकाबले जरा सी बड़ी है। हालांकि, इसकी चौड़ाई और ऊंचाई थोड़ी कम है। ग्लोबल मार्केट में ऑफर की जा रही VF5 का ग्राउंड क्लीयरेंस 169 मिमी है। भारतीय वर्जन में यह थोड़ा बढ़ सकता है। बूट स्पेस 260 लीटर है, जिसे 900 लीटर तक बढ़ाया जा सकता है। पीछे की सीटों में 60:40 स्प्लिट-फोल्डिंग फंक्शन दिया गया है। VF5 में ब्रैंड का सिग्नेचर फ्रंट फेसिया, फ्लेयर्ड वील आर्च, ब्लैक बॉडी क्लैडिंग, एलईडी लाइटिंग, 17 इंच के वील (वियतनामी वेरिएंट में) और कई सारे फीचर्स मिलते हैं। कुल मिलाकर इसका डिजाइन एसयूवी जैसा लगता है।

    ग्लोबल मार्केट में उपलब्ध VF5 पांच सीटों वाली कार है। Vinfast के बाकी मॉडल्स की तरह इसका इंटीरियर भी मॉडर्न और मिनिमलिस्टिक डिजाइन वाला है। इसमें सिल्वर एक्सेंट के साथ ऑल-ब्लैक थीम का यूज किया गया है। स्टीयरिंग वील तीन स्पोक वाला है और इसमें कंट्रोल बटन लगे हुए हैं। कार के ग्लोबल मॉडल में PM 2.5 एयर फिल्टर, 7 इंच का डिजिटल ड्राइवर डिस्प्ले, 4 स्पीकर वाला साउंड सिस्टम, लेदरेट सीट्स, कीलेस एंट्री और गो, ऑटो हेडलाइट्स, वॉइस कमांड सपोर्ट और वायरलेस ऐपल कारप्ले और ऐंड्रॉयड ऑटो के साथ 8 इंच का इंफोटेनमेंट यूनिट दिया गया है। हो सकता है कि इसके इंडियन वेरिएंट को कंपनी कुछ बदलावों के साथ लॉन्च करे।

    326 किमी तक की रेंज
    VF5 में दी जा रही बैटरी का साइज अलग-अलग मार्केट्स में अलग-अलग होता है। कुछ रीजन में यह 29.6 kWh की बैटरी के साथ उपलब्ध है, जिसकी NEDC रेंज प्रति चार्ज 268 किमी है। जबकि, बाकी रीजन में इसमें 37.23 kWh की बड़ी बैटरी मिलती है, जिसकी रेंज 326 किमी (NEDC) है।

    छोटी बैटरी 33 मिनट से भी कम समय में 10 से 70 पर्सेंट तक चार्ज हो जाती है। छोटे बैटरी वाले वर्जन में 93hp/135Nm की इलेक्ट्रिक मोटर लगी है, जबकि दूसरे वर्जन का आउटपुट 134hp/135Nm है। 93hp (70kW) वाला वर्जन 0 से 100 kmph की स्पीड 14 सेकंड में पकड़ लेता है। 136hp वाला वर्जन यही काम 11 सेकंड से भी कम समय में कर पाता है।

  • OpenAI की मुश्किलें बढ़ी, पेंटागन डील के बाद ChatGPT अकाउंट्स की हो रही बर्खास्तगी, Claude AI को मिल रही सफलता

    OpenAI की मुश्किलें बढ़ी, पेंटागन डील के बाद ChatGPT अकाउंट्स की हो रही बर्खास्तगी, Claude AI को मिल रही सफलता

    नई दिल्ली

    दुनिया के सबसे लोकप्रिय एआई चैटबॉट ChatGPT के लिए मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. हाल ही में OpenAI द्वारा अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के साथ हाथ मिलाने की खबर ने आम यूजर्स को नाराज कर दिया है. लोग इस कदर गुस्से में हैं कि सोशल मीडिया पर डिलीट चैटजीपीटी (#DeleteChatGPT) ट्रेंड करने लगा है. आलम यह है कि लोग न सिर्फ अपने अकाउंट डिलीट कर रहे हैं, बल्कि ऐप स्टोर पर इसे वन-स्टार की रेटिंग भी दे रहे हैं | 
    क्या है पूरा विवाद?

    यह विवाद तब शुरू हुआ, जब OpenAI कंपनी ने अपने नियमों में बदलाव करते हुए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन के साथ हाथ मिला लिया. इससे पहले ChatGPT सैन्य और युद्ध संबंधी कार्यों के लिए इस्तेमाल न होने की बात कह रहा था. अब पेंटागन के साथ समझौते का मतलब है कि OpenAI की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अमेरिकी सेना अपनी रणनीतियों और साइबर सिक्योरिटी के लिए करेगी. यूजर्स का मानना है कि जो एआई 'मानवता की भलाई' के लिए बनाया गया था, अब उसका इस्तेमाल युद्ध और सैन्य उद्देश्यों के लिए होना इस सिद्धांत के खिलाफ है. इसी डर और नाराजगी के कारण पिछले कुछ दिनों में ChatGPT को डिलीट करने वालों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया है | 

    क्या है पूरा मामला?

    Sam Altman ने अपनी पोस्ट में बताया कि OpenAI ने Department of Defense के साथ अपने एग्रीमेंट में कुछ अहम बदलाव किए हैं| 

     उन्होंने बताया की ऐसा इसलिए क्योंकि यह साफ हो सके कि कंपनी के AI सिस्टम का इस्तेमाल अमेरिकी नागरिकों की निगरानी के लिए नहीं किया जाएगा| 

    उन्होंने साफ लिखा कि कानून के दायरे में रहते हुए AI का इस्तेमाल किया जाएगा और इसे जानबूझकर डोमेस्टिक सर्विलांस के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा| 

    Altman ने यह भी कहा कि सरकार की तरफ़ से अगर कोई असंवैधानिक आदेश आता है तो वे उसका पालन नहीं करेंगे| 

    उनका कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया सबसे ऊपर है और सरकार को फैसले लेने चाहिए, न कि कोई निजी कंपनी दुनिया का भविष्य तय करे. लेकिन विवाद यहीं से शुरू हुआ| 

    गुस्सा क्यों बढ़ा?

    TechCrunch की रिपोर्ट बताती है कि जैसे ही यह खबर फैली कि OpenAI अमेरिकी रक्षा विभाग के साथ काम कर रही है, बड़ी संख्या में लोगों ने ChatGPT ऐप हटाना शुरू कर दिया|  

    सिर्फ एक दिन में अनइंस्टॉल में 295 प्रतिशत की उछाल दर्ज किया गया . सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि क्या AI अब युद्ध मशीन का हिस्सा बनने जा रहा है| 

    कुछ यूजर्स का कहना है कि AI कंपनियों को सेना से दूरी बनाकर रखनी चाहिए. वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर AI इतना शक्तिशाली है तो उसे सरकार के साथ जिम्मेदारी से काम करना चाहिए, ताकि गलत हाथों में न जाए| 

    Anthropic का नाम क्यों आया बीच में?

    इस पूरे विवाद में एक और AI कंपनी Anthropic का जिक्र हो रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक Anthropic ने रक्षा विभाग के साथ कुछ शर्तों पर असहमति जताई थी और साफ रुख अपनाया था कि उनकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल मास सर्विलांस या ऑटोनोमस हथियारों में नहीं होना चाहिए| 

    इसके बाद OpenAI ने अपनी डील आगे बढ़ाई. इससे यह बहस और तेज हो गई कि आखिर AI कंपनियां किस दिशा में जा रही हैं. क्या वे सरकार के साथ मिलकर सुरक्षा मजबूत कर रही हैं या एक खतरनाक रास्ते की ओर बढ़ रही हैं?

    Altman ने क्या माना?

    Sam Altman ने अपनी पोस्ट में यह भी स्वीकार किया कि डील को लेकर कम्युनिकेशन बेहतर हो सकता था. उन्होंने कहा कि यह एक जटिल मुद्दा है और इसे जल्दी में सार्वजनिक करना शायद सही तरीका नहीं था| 

    उनका कहना है कि टेक्नोलॉजी अभी कई मामलों में पूरी तरह तैयार नहीं है और सुरक्षा को लेकर बहुत सावधानी जरूरी है| 

    उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में OpenAI सरकार के साथ मिलकर तकनीकी सुरक्षा उपायों और सेफगार्ड पर काम करेगा ताकि AI का गलत इस्तेमाल न हो| 

    यह सब अभी क्यों अहम है?

    दुनिया इस वक्त युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के दौर से गुजर रही है. साइबर हमले, ड्रोन टेक्नोलॉजी, डेटा एनालिसिस और इंटेलिजेंस में AI का रोल तेजी से बढ़ रहा है| 

    ऐसे समय में अगर कोई बड़ी AI कंपनी सीधे रक्षा विभाग के साथ काम करती है तो यह सिर्फ टेक्नोलॉजी की खबर नहीं रहती, यह राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा बन जाती है| 

    एक तरफ सरकारें कहती हैं कि AI से देश की सुरक्षा मजबूत होगी. दूसरी तरफ नागरिक अधिकार समूह चेतावनी दे रहे हैं कि निगरानी और डेटा कंट्रोल का दायरा खतरनाक रूप ले सकता है| 

    असली सवाल क्या है?

    इस पूरे विवाद का केंद्र एक ही है. AI पर कंट्रोल किसका होगा? सरकार का, निजी कंपनी का या जनता की लोकतांत्रिक निगरानी का?

    Sam Altman का कहना है कि लोकतंत्र को नियंत्रण में रहना चाहिए और AI को लोगों को ताकत देनी चाहिए, उनसे छीननी नहीं चाहिए. लेकिन जनता का एक हिस्सा आश्वस्त नहीं है. अनइनस्टॉल के आंकड़े यही दिखा रहे हैं| 

    आने वाले समय में यह मुद्दा और बड़ा हो सकता है, क्योंकि AI अब सिर्फ चैटबॉट नहीं रहा. यह सुरक्षा, युद्ध, साइबर ऑपरेशन और रणनीतिक फैसलों का हिस्सा बन रहा है. ऐसे में हर डील, हर बयान और हर फैसला वैश्विक बहस का विषय बनेगा.

    और यही वजह है कि Pentagon और OpenAI की यह डील सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट नहीं, बल्कि AI के भविष्य की दिशा तय करने वाली कहानी बन चुकी है| 

    Sam Altman ने अपने ट्वीट में क्या-क्या साफ किया?

    Sam Altman ने अपने लंबे पोस्ट में सबसे पहले यह कहा कि OpenAI और अमेरिकी रक्षा विभाग के बीच जो एग्रीमेंट हुआ है, उसमें खास भाषा जोड़ी गई है ताकि कंपनी के सिद्धांत बिल्कुल साफ रहें| 

    उन्होंने लिखा कि AI सिस्टम का इस्तेमाल जानबूझकर अमेरिकी नागरिकों की निगरानी के लिए नहीं किया जाएगा. उन्होंने अमेरिकी संविधान, फोर्थ अमेंडमेंट और FISA जैसे कानूनों का जिक्र करते हुए कहा कि सब कुछ कानूनी दायरे में ही होगा| 

    प्राइवेसी एडवोकेट्स इसे दिखावा मान रहे हैं 

    Altman ने यह भी साफ किया कि Department of Defense ने यह समझा है कि यह लिमिटेशन सिर्फ कागज पर नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि किसी भी तरह की ट्रैकिंग , सर्विलांस या मॉनिटरिंग के लिए OpenAI की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

    यानी कंपनी यह दिखाना चाहती है कि नागरिकों की प्राइवेसी को लेकर वह पीछे नहीं हटेगी. हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है की ये सिर्फ एक दिखावा है ताकि कंपनी से लागों का ट्रस्ट ना टूटे| 

    उन्होंने एक और अहम बात कही. अगर किसी इंटेलिजेंस एजेंसी जैसे NSA को OpenAI की सर्विस चाहिए होगी, तो उसके लिए अलग से कॉन्ट्रैक्ट मॉडिफिकेशन करना पड़ेगा. यानी मौजूदा डील ऑटोमैटिकली सभी एजेंसियों को एक्सेस नहीं देती|  

    Altman ने यह भी माना कि यह फैसला बहुत संवेदनशील है, टेक्नोलॉजी अभी हर चीज के लिए तैयार नहीं है, और कई ट्रेड ऑफ़्स को लेकर अभी पूरी समझ बनना बाकी है. उनके मुताबिक, यह एक सीखने की प्रक्रिया है और आगे भी safeguards को मजबूत किया जाएगा.

    क्या कहता है डेटा?

    मार्केट इंटेलिजेंस फर्म Sensor Tower के अनुसार, शनिवार, 28 फरवरी को अमेरिका में ChatGPT ऐप के अनइंस्टॉल में एक दिन में 295 प्रतिशत की भारी बढ़त हुई. यह पिछले 30 दिनों में ऐप की औसत 9 प्रतिशत की डेली अनइंस्टॉल दर की तुलना में बेहद ज्यादा है. वहीं OpenAI और पेंटागन के बीच हुए समझौते की खबर के बाद ChatGPT के डाउनलोड में अचानक उछाल आया था. लेकिन इसकी घोषणा होते ही डाउनलोड की गति धीमी हो गई. शनिवार को अमेरिका में डाउनलोड में 13 प्रतिशत की गिरावट आई और रविवार को इसमें 5 प्रतिशत की और गिरावट देखी गई. इससे ठीक एक दिन पहले, जब साझेदारी की घोषणा नहीं हुई थी, तब डाउनलोड में 14 प्रतिशत की बढ़त हुई थी| 
    Claude को मिला लोगों का प्यार

    ChatGPT से नाराज यूजर्स अब विकल्प तलाश रहे हैं. इस गुस्से का सबसे बड़ा फायदा OpenAI की प्रतिद्वंद्वी कंपनी Anthropic के एआई मॉडल Claude को मिल रहा है. क्योंकि Anthropic ने ट्रंप प्रशासन के सामने इस तरह की कोई डील करने से मना कर दिया था. जिसके बाद से पिछले एक हफ्ते में Claude के डाउनलोड्स में भारी इजाफा देखा गया है. Claude खुद को अधिक सुरक्षित और नैतिक एआई (Ethical AI) के रूप में पेश करता है, जो फिलहाल किसी भी सैन्य प्रोजेक्ट से दूर रहने का दावा कर रहा है | 
    एलन मस्क का डर हुआ सच?

    दिलचस्प बात यह है कि Elon Musk लंबे समय से चेतावनी दे रहे थे कि OpenAI अपनी राह से भटक रहा है. मस्क ने पहले भी कहा था कि एआई का मिलिट्राइजेशन पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकता है. अब पेंटागन के साथ इस गठबंधन ने मस्क की उन चिंताओं को सही साबित कर दिया है, जिससे यूजर्स का भरोसा हिल गया है | 
    कैसा होगा आने वाला समय?

    OpenAI का तर्क है कि वे केवल साइबर सिक्योरिटी और लॉजिस्टिक्स जैसे कामों में पेंटागन की मदद कर रहे हैं, हथियार बनाने में नहीं. लेकिन यूजर्स इसे हथियारों की होड़ की शुरुआत मान रहे हैं. रेटिंग गिरने और यूजर्स कम होने से कंपनी की साख पर गहरा असर पड़ा है. ChatGPT की वन-स्टार रेटिंग केवल एक गुस्सा नहीं, बल्कि एआई की नैतिकता पर एक बड़ा सवाल है | 

  • कच्चा तेल 100 डॉलर के पार, ईरान संकट के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की संभावना

    कच्चा तेल 100 डॉलर के पार, ईरान संकट के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की संभावना

    नई दिल्ली

    क्या पश्चिम एशिया में छिड़ा नया सैन्य टकराव भारतीयों की जेब पर भारी पड़ने वाला है? ईरान पर हुए ताज़ा हमले के बाद होरमुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव चरम पर है और वैश्विक तेल बाज़ार में घबराहट साफ दिख रही है. ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुका है और आशंका है कि हालात बिगड़े तो कीमतें 100 डॉलर के पार जा सकती हैं | 

    तेल के लिए 85–90 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर भारत के लोगों के लिए यह बड़ा प्रश्न है कि क्या यहां पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ सकते हैं? आशंका तो यह भी है कि अगर हालात जल्दी ही ठीक नहीं हुए, तो ऑयल कंपनियां भाव में 12 से 14 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं | 

    एक अच्छी बात यह भी है कि भारत ने अपने तेल आयात के दूसरे विकल्पों को फिर से टटोलना शुरू कर दिया है, ताकि आम लोगों पर किसी तरह का संकट न आए. भारत में रणनीतिक पेट्रोलियम रिवर्ज का बड़ा भंडार यह आश्वासन देता है कि संभवत: देश में पेट्रोल और डीजल के दाम न बढ़ें | 

    केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया कि भारत का पेट्रोलियम रिजर्व 74 दिनों की मांग पूरी कर सकता है. इसमें ISPRL की SPR कैविटी, रिफाइनरी स्टॉक और फ्लोटिंग स्टोरेज शामिल हैं. ISPRL और PIB के डेटा के अनुसार, भारत के पास 5.33 MMT क्रूड ऑयल तीन भूमिगत भंडारों में है. विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पदुर. SPR अकेले 9-10 दिन का स्टॉक है, लेकिन सभी तेल कंपनियों का कमर्शियल स्टॉक मिलाकर कुल 70-75 दिन का बफर बनता है. तो कुल मिलाकर, शायद ऐसा संकट नहीं आएगा कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम अनियंत्रित हो जाएं. फिर भी, पेट्रोल के दाम कैसे बढ़ते हैं, इस बारे में जान लेना आवश्यक है | 
    कंपनियों के हाथ में है चाबी

    भारत में पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकार तय करती थी, लेकिन अब यह पूरी तरह से तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के हाथ में है. जून 2010 में सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को और अक्टूबर 2014 में डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त (De-regulate) कर दिया था. इसका मतलब कि सरकार का तेल की कीमतों पर कंट्रोल नहीं है.

    अब तेल की कीमत हर सुबह 6 बजे बदलती है. 16 जून 2017 से भारत में डायनेमिक फ्यूल प्राइसिंग (Dynamic Fuel Pricing) लागू है. इसके तहत अब कीमतें 15 दिन में नहीं, बल्कि पिछले 15 दिनों के अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के औसत दाम और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति के आधार पर हर रोज सुबह 6 बजे तय की जाती हैं | 
    1 डॉलर बढ़ने पर आपकी जेब से कितना असर?

        अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बैरल में खरीदा जाता है, जबकि भारत में पेट्रोल-डीज़ल लीटर में बिकते हैं.
        एक बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है.
        जब कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो इसे 159 लीटर में बांटने पर प्रति लीटर करीब 0.006 डॉलर की बढ़ोतरी होती है.
        भारत तेल डॉलर में खरीदता है. अगर डॉलर का भाव 91 रुपये है, तो प्रति लीटर यह बढ़ोतरी लगभग 57 पैसे बैठती है.

    यानी बाजार की आम धारणा के अनुसार, कच्चे तेल में 1 डॉलर की तेजी से खुदरा कीमतों में करीब 50 से 60 पैसे प्रति लीटर का इजाफा होता है. लेकिन संकट के समय अगर रुपया कमजोर होकर 92 या 93 रुपये तक पहुंच जाए, तो यह असर 65 पैसे या उससे अधिक भी हो सकता है. कच्चे तेल की तेजी और रुपये की गिरावट मिलकर ग्राहकों को दोहरा झटका देती है | 
    100 डॉलर पर कितना बढ़ेगा बोझ?

        90 डॉलर प्रति बैरल: रिटेल कीमतों में करीब 5 से 6 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी संभव है.
        100 डॉलर प्रति बैरल: यह बढ़ोतरी 12 से 14 रुपये प्रति लीटर तक जा सकती है.
        110 डॉलर प्रति बैरल: पेट्रोल-डीज़ल 18 से 21 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो सकते हैं.

    ये अनुमान केवल मूल गणित पर आधारित हैं. वास्तविक कीमतों में टैक्स जुड़ने के बाद असर और बढ़ जाता है.
    पंप पर कीमत कैसे बनती है?

    जब आप पेट्रोल पंप पर भुगतान करते हैं, तो आप सिर्फ तेल का पैसा नहीं दे रहे होते. भारत में पेट्रोल-डीजल की कुल कीमत का लगभग 40% से 50% हिस्सा सिर्फ टैक्स होता है| 

        बेस प्राइस: सबसे पहले कच्चे तेल की कीमत में समुद्री ढुलाई और इंश्योरेंस जैसी लागत जुड़ती है (रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस).
        केंद्र का टैक्स: इसके ऊपर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) जुड़ती है.
        डीलर का मुनाफा: फिर पेट्रोल पंप मालिक का कमीशन शामिल होता है.
        राज्य का टैक्स: अंत में राज्य सरकारें अपना टैक्स लगाती हैं. चूंकि यह प्रतिशत में होता है, इसलिए जैसे ही कच्चे तेल का बेस प्राइस बढ़ता है, टैक्स की राशि भी अपने आप बढ़ जाती है. यही कारण है कि हर राज्य में कीमतें अलग-अलग होती हैं. चूंकि पेट्रोल-डीजल फिलहाल GST के दायरे से बाहर हैं, इसलिए इन पर टैक्स का बोझ काफी ज्यादा रहता है.

    भारत का रिजर्व आएगा काम?

    स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है. भारत की प्रमुख तेल विपणन कंपनियां कई बार शार्ट टर्म का झटका खुद सहकर अचानक कीमत बढ़ोतरी को टालने की कोशिश करती हैं. इसके अलावा केंद्र सरकार चाहे तो उत्पाद शुल्क में कटौती कर सकती है, जैसा 2022 में किया गया था. भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) भी हैं, जिनका उपयोग आपूर्ति संतुलित रखने के लिए किया जा सकता है | 

  • मिडिल ईस्ट संकट के कारण सोना हुआ महंगा, 10,500 रुपए प्रति दस ग्राम, चांदी के रेट भी रिकॉर्ड तोड़

    मिडिल ईस्ट संकट के कारण सोना हुआ महंगा, 10,500 रुपए प्रति दस ग्राम, चांदी के रेट भी रिकॉर्ड तोड़

    ग्वालियर
    ईरान-इजराइल के बीच शुरू हुए हमले के असर से एक बार सोने और चांदी के भाव में जोरदार तेजी देखी जा रही है। प्योर सोने के भाव में 10,500 रुपए प्रति दस ग्राम की तेजी आई और सराफा बाजार में सोने के भाव फिर 1.71 लाख रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच गए। वहीं जेवराती सोना 1.59 हजार रुपए प्रति दस ग्राम बिका। इसके साथ ही चांदी में भी तेजी रही, 10 हजार रुपए प्रति किलो की बढ़त के साथ यह 2.82 लाख रुपए प्रति किलो बिकी। सराफा बाजार में एमसीएक्स के आधार पर सोने और चांदी के भाव तय होते हैं।
    युद्ध का असर सोना-चांदी पर भी

    ग्वालियर शहर के सराफा व्यापारियों के मुताबिक यदि दोनों देशों के बीच हमले बढ़ते हैं तो भाव में और तेजी आ सकती है। सोना-चांदी व्यवसायी संघ लश्कर के अध्यक्ष पुरुषोत्तम जैन ने कहा, युद्ध का असर सोना-चांदी पर भी है। हालांकि अभी ग्राहकी पर इसका खास असर देखने को नहीं मिल रहा है। 24 कैरेट सोने का दाम 1,59,080 रुपए प्रति ग्राम रहा, जबकि आज 20000 रुपए की बढ़ोतरी के साथ सर्राफा बाजार में चांदी 3,20,000 रुपए प्रति किलो के आसपास बिक रही है।

    तेजी लेकिन दोनों धातु अभी रिकॉर्ड भाव से सस्ती

    दोनों धातुओं के भाव में तेजी के बावजूद सोना और चांदी अभी भी अपने रिकॉर्ड भाव से सस्ते बिक रहे हैं। सोना रिकॉर्ड भाव 29 जनवरी को 1 लाख 84 हजार 500 रुपए प्रति दस ग्राम था। वहीं चांदी का रिकॉर्ड भाव उसी दिन 4 लाख 5 हजार रुपए प्रति किलो था, यानी चांदी अभी भी अपने ऑल टाइम हाई से 1.23 लाख रुपए सस्ती बिक रही है।

    निवेशकों में डर का माहौल
    बीते दो दिनों से माहैल बदला हुआ है। बाजार के जानकारों का कहना है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद निवेशकों में डर का माहौल है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत और तेहरान की ओर से जवाबी हमलों की खबरों ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। ऐसे समय में लोग जोखिम भरे निवेश से बच रहे हैं और सोने-चांदी को सबसे सुरक्षित (Safe-Haven) मानकर खरीदारी कर रहे हैं।